हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी

हॉकी के भगवान कहे वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी

हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी

आप सभी लोगों ने मेजर ध्यानचंद का नाम अवश्य सुना होगा। मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता था। यदि आप सभी को मेजर ध्यानचंद के बारे में नहीं पता है। तो आज मैं इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को मेजर ध्यानचंद जी अर्थात हॉकी का बेताज बादशाह और जादूगर जैसे नामों से जाना जाने वाला इंसान था। इनकी पूरी जिंदगी को विस्तार से बताने जा रहा हूं। पहले ही मैच में तीन गोल जीतने वाले मेजर ध्यानचंद ओलंपिक खेलों में लगभग 35 गोल और अंतरराष्ट्रीय मैचों में करीब 400 गोल किए थे। अगर सभी आंकड़ों को एक साथ लाया जाए तो लगभग 1000 से ज्यादा गोल का आंकड़ा मेजर ध्यानचंद्र को जाता है। (हॉकी के भगवान कहे वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी )

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मेजर ध्यानचंद के जीवन के जीवन के उन पहलुओ को विस्तार से बताने जा रहा हूं। जिसे सुनकर आप भी यह समझ जाएंगे कि दुनिया के इतिहास में मेजर ध्यानचंद जैसा  बड़ा हॉकी का खिलाड़ी ना तो पैदा हुआ है। और ना आगे होगा। कहा जाता है कि जब मेजर ध्यानचंद हॉकी खेलने के लिए फील्ड में उतरते थे। तो मानो ऐसा लगता था। कि हॉकी का बॉल उनके हॉकी स्टिक से बिल्कुल चिपक जाता था। कई बार तो मेजर ध्यानचंद के साथ ऐसा भी हुआ कि जब वह हॉकी खेल रहे थे। तो उनके विपक्ष में खेल रहे सभी खिलाड़ियों को शक होने लगा था। कि कहीं मेजर ध्यानचंद किसी खास हॉकी स्टिक के साथ तो नहीं खेल रहे हैं। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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इसी सब कारणों से एक बार जब मेजर ध्यानचंद हॉलेंड में हॉकी खेल रहे थे। तो इसी शक की वजह से उनके विरोध में खेल रहे खिलाड़ियों ने उनके हॉकी स्टिक की जांच करवाई। वहाँ के वरिष्ठ अधिकारी जो खेल को देख रहे थे। उन्होंने मेजर ध्यानचंद के हॉकी स्टिक को तोड़ के उसकी जांच पड़ताल भी करवा डाली थी। लेकिन अंततः के वरिष्ठ खेल अधिकारियों को मेजर ध्यानचंद के हॉकी स्टिक में ऐसा कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ जिससे उन्हें शक हो सके। यह तो मेजर ध्यानचंद के हॉकी खेलने का तरीका था। उनका हॉकी खेलने के प्रति प्यार था। और उनका लग्न जोश था। कि मानो ऐसा लगता था। कि की की बॉल मेजर ध्यानचंद की हॉकी स्टिक सेहट ही नहीं रही हो। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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कहा जाता है कि दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह हिटलर और क्रिकेट के दुनिया के महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन को भी मेजर ध्यानचंद के खेलने अपना दीवाना बना लिया था। तो आइए जानते हैं हम उस समय के पहलुओं को जब भारत और जर्मनी के बीच आमने-सामने हॉकी का खेल खेला जा रहा था। यह बात है 4 अगस्त 1936 को जब भारत और जर्मनी के हॉकी का खेल सामने हो रहा था। जर्मनी का वह स्टेडियम भीड़ से पूरा खचाखच भरा हुआ था। जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह हिटलर भी अपनी टीम का हौसला बुलंद करने के लिए स्टेडियम पहुंचे हुए थे। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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कहा जाता है कि पहले हाफ में तो मुकाबला बहुत ही ज्यादा कठिन हुआ। लेकिन भारत 1.0 से अपनी बढ़त बनाने में कामयाब रहा था। लेकिन पहले हाफ के बाद जो उस मैच हुआ वह बहुत ही चौका देने वाला था। हालांकि यह मैं जर्मनी में खेला जा रहा था। इसी कारण से जर्मनी के विशेषज्ञों ने खेले जा रहे पिच को जरूरत से ज्यादा गिला करवा दिया। ताकि भारत के खिलाड़ी जो सस्ते जूते पहने हुए हैं। वह आसानी से उस मैदान में दौड़ ना सके। जर्मनी के विशेषज्ञों ने यह सोचा था। कि भारत से आए हुए सभी खिलाड़ी जो सस्ते जूते पहने हुए हैं। गीले बीच होने के कारण आसानी से दौड़ नहीं पाएंगे। और इस तरह से जर्मनी यह हॉकी का खेल जीत जाएगा। जब मेजर ध्यानचंद के दिमाग में यह बात आई। तो वहां के चाल को अच्छी तरह से समझ चुके थे। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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वह समझ चुके थे। कि यह सब भारत को हराने के लिए यहां के लोगों की एक विशेष चाल है। इन सब चीजों को देखकर मेजर ध्यानचंद ने अपने जूते खोल दिए। ताकि वह अच्छी तरह से गीले फील्ड में भी आसानी से दौड़ सके। मेजर ध्यानचंद के जूते उतार देने के बाद उनकी टीम के सभी मेंबर को भी यह बात समझ में आ चुकी थी। कि यह जर्मनी की एक विशेष चाल है। जिससे वह अब समझ चुके थे। इसी कारण से मेजर ध्यानचंद के साथ उनके सभी साथी ने भी अपने जूते निकाल दिए। और उसके बाद एक से बढ़कर गोल्ड लगते रहे। इस तरह से वह होटल 7 गोल और प्राप्त कर चुके थे।

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जर्मनी के इस तरह की शर्मनाक हार को देखकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर बोखला चुके थे। जर्मनी के तानाशाह हिटलर खेल बीच से ही मैदान छोड़कर चले गए। मेजर ध्यानचंद के अद्भुत खेल को देखते हुए अगले ही दिन के तानाशाह हिटलर ने उन्हें अपनी ऑफिस में बुलाया। जब मेजर ध्यानचंद हिटलर के ऑफिस पहुंचे तो हिटलर उन्हें ऊपर से नीचे घूर-घूर के देखता जा रहा था। मेजर ध्यानचंद के जूते फटे हुए थे। इसी कारण से तानाशाह हिटलर ने मेजर ध्यानचंद के जूते के इशारा एक अच्छी नौकरी का लालच दिया। हिटलर ने मेजर ध्यानचंद से कहा कि इंडिया के बदले मेरे तरफ से खेलो। तुम्हें अच्छी पगार और रहने के लिए जर्मनी में अच्छा मकान दूंगा। बहुत धन का लालच देकर हिटलर मेजर ध्यानचंद को खरीदने की कोशिश कर रहा था।(हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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लेकिन मेजर ध्यानचंद भारत के सच्चे देशभक्त होने के कारण उन्होंने हिटलर के द्वारा दिए गए इस प्रलोभन को साफ इनकार कर दिया। और तत्कालीन जर्मनी के तानाशाह हिटलर को इस बात से मना करते हुए वह वापस भारत आ गए। भारत के अलावा भी मेजर ध्यानचंद के चाहने वालों की कमी नहीं थी। क्रिकेट जगत के महान क्रिकेटर डॉन ब्रेडमन भी मेजर ध्यानचंद की बहुत सारी तारीफें की है। महान क्रिकेटर डॉन ब्रैडमैन ने कहा है की कि मेजर ध्यानचंद ऐसे गोल बनाते हैं। जैसे कोई क्रिकेट के रन बना रहा हो। मुझे आशा है कि आप शायद आप सभी को यह ज्ञात हो गया होगा। कि मेजर ध्यानचंद को हॉकी का बेताज बादशाह और जादूगर क्यों कहा जाता था। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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तो आइए हम जानते हैं कि मेजर ध्यानचंद के शुरुआती दौर में उनका जीवन कैसा था। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश में हुआ था। हालांकि जब मेजर ध्यानचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रयाग में हुआ था। उस समय उत्तर प्रदेश का यह जगह प्रयाग के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश के इसी जगह को आज हम इलाहाबाद के नाम से जानते हैं। मेजर ध्यानचंद के पिता का नाम समेश्वर दत्त सिंह था। मेजर ध्यानचंद के पिता सेना में एक सिपाही थे। मेजर ध्यानचंद के माता का नाम श्रद्धा सिंह था। मेजर ध्यानचंद की माता बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। मेजर ध्यानचंद का जब जन्म हुआ। तो उन्हें बचपन से ही हॉकी का कोई खास लगाव नहीं होता था। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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बचपन से हॉकी के खेल में ज्यादा रुचि नहीं रखते थे। लेकिन बचपन से ही वह रेसलिंग के खेलों में ज्यादा ध्यान लगाते थे। मेजर ध्यानचंद अपने इलाहाबाद के ही पास के स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। 16 साल की आयु में ही सेना में शामिल हो गए। सेना में भर्ती होने के बाद मेजर ध्यानचंद का हॉकी के खेल में रूचि बढ़ने लगा। जब मेजर ध्यानचंद सेना को ज्वाइन किए थे। उसी समय में उनके साथ एक काम करने वाले मेजर तिवारी ने ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए बहुत ज्यादा प्रेरित किया। समय बीतने के साथ साथ मेजर ध्यानचंद को हॉकी खेलने का एक जुनून सा छा चुका था। कहा जाता है कि मेजर ध्यानचंद के ऊपर हॉकी का इतना नशा छा चुका था। कि वह दिन भर के अपनी ड्यूटी करने के बाद रात के चांदनी रातों में हॉकी की प्रेक्टिस किया करते थे। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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आप लोगों को यह जानकर बहुत हैरानी होगी। कि मेजर ध्यानचंद सिंह का नाम ध्यानचंद रखे जाने के पीछे भी एक लंबी कहानी है। अभी की जानकारी तक मेजर ध्यानचंद सिंह का नाम सिर्फ मेजर ध्यान हुआ करता था। लेकिन हॉकी के खेल के प्रति ऐसे दीवाने पन को देख कर और अपनी पूरी ड्यूटी करने के बाद रात के चांदनी किरणों में इन्हें खेलता हुआ देखकर उनके साथी ने इनके नाम के पीछे चंद्र जोड़ दिया था। तब से मेजर ध्यान मेजर ध्यानचंद सिंह हो चुके थे। बिना किसी ट्रेनिंग और बिना किसी शिक्षक के मदद के बाद भी मेजर ध्यानचंद ने खुद को दुनिया का सबसे बड़ा हॉकी का खिलाड़ी बना दिया। सही कहा जाता है। यदि किसी काम को करने के प्रति हमारे अंदर में दृढ़ संकल्प हो। तो उस काम को हम अवश्य किसी न किसी दिन कर लेते हैं। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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मेजर ध्यानचंद के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनके द्वारा किया गया कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प एक दिन ऐसा समय ले आया कि मेजर ध्यानचंद का नाम हॉकी के लिए सबसे ऊपर और आदर से लिया जाने लगा। सेना की तरफ से अच्छे खेलने के कारण मेजर ध्यानचंद को अच्छे प्रमोशन मिलते गए। और एक समय ऐसा आया जब मेजर ध्यानचंद एक साधारण सिपाही से मेजर की पोस्ट तक पहुंच चुके थे। अब ऐसा समय आ चुका था। कि मेजर ध्यानचंद को अंतर्राष्ट्रीय खेलों के लिए चुना जाने लगा था। 1926 ईस्वी में मेजर ध्यानचंद को अंतरराष्ट्रीय खेल के लिए चुना गया। पहला अंतरराष्ट्रीय खेल मेजर ध्यानचंद ने न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था। 1927 ईस्वी में मेजर ध्यानचंद को ब्रिटिश टीम के खिलाफ खेलने का मौका मिला

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जिसमें मेजर ध्यानचंद ने 72 में से 42 गोल किए थे। 1928 ईस्वी में मेजर ध्यानचंद नीदरलैंड के खिलाफ अपनी हॉकी के खेल का विशाल प्रदर्शन दिखाया। और इस तरह से मेजर ध्यानचंद के अच्छे खेल खेलने के कारण भारत को नीदरलैंड के खिलाफ जीत प्राप्त हुई थी। इस तरह से 1932 ईस्वी में लॉस एंजिलिस के खिलाफ अपना ऐसा प्रदर्शन दिखाया। जिसे देख वहां बैठे सभी लोग चकित हो चुके थे। भारत ने अमेरिका को 24-1 से हरा कर गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया था। इस तरह से 1948 ईस्वी तक 42 साल की आयु होने के बाद भी ध्यानचंद ने अंतरराष्ट्रीय खेलों में पूरा योगदान दिया था। इसके बाद मेजर ध्यानचंद ने खेल से सन्यास ले लिया था। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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लेकिन देश के प्रति प्यार और हॉकी के प्रति लगाव होने के कारण रिटायर होने के बाद भी मेजर ध्यानचंद आर्मी के होने वाले हॉकी खेल में अपना पूरा योगदान देते रहे थे। 1956 में मेजर ध्यानचंद को भारत के तीसरे सबसे बड़े बलिदान सम्मान पदम विभूषण से सम्मानित किया गया था। मेजर ध्यानचंद ने हॉकी को एक नया रूप और रंग दिया था। मेजर ध्यानचंद हॉकी के जगत में ऐसा कर दिया था। लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते थे। इसी कारण से मेजर ध्यानचंद के जन्म दिवस यानी कि 29 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

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लेकिन हॉकी के इस महान खिलाड़ी के आखिरी दिन बहुत कष्ट से गुजरे। कहा जाता है कि इतने बड़े सम्मान पानी वाले मेजर ध्यानचंद को अपने आखिरी दिन में बहुत बुरे दिन का सामना करना पड़ा था। भारत के लोग ध्यानचंद के इस दिन को भूल चुके थे। आखरी दिन में मेजर ध्यानचंद को लिवर कैंसर की शिकायत हो गई थी। पैसे की तंगी और आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण मेजर ध्यानचंद दिल्ली के एम्स के जेनरल वार्ड में ही अपना दम तोड़ दिए थे। इस तरह से हॉकी जगत में अपना नाम रोशन करने वाले और भारत के नाम को विश्व विख्यात बनाने वाले मेजर ध्यानचंद 3 दिसंबर 1979 को अपना दम तोड़ दिया। (हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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लेकिन मेजर ध्यानचंद को आज भी हॉकी खेल को पसंद करने वाले भगवान की तरह पूजते हैं। यदि आप सभी को मेजर ध्यानचंद के जीवन के जानकारी पसंद आई हो तो आप इसे अपने दोस्त परिवारों के बीच में अवश्य शेयर करें। ताकी हमारे उन सभी भारतवासियों को पता चल सके कि एक साधारण इंसान कैसे अपने जीवन में इतने बड़े लक्ष्य की प्राप्ति कर पाया। यदि आप सभी को मेजर ध्यानचंद के जीवन के बारे में कुछ प्रश्न पूछना हो तो आप हमें कमेंट करके बता सकते हैं। कॉमेंट करने का विकल्प आपको इस पोस्ट नीचे आसानी से प्राप्त हो जाएगा।(हॉकी के भगवान कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के जीवनी)

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