स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी

स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी

स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी

भारत देश के मठ वासी जिसे संत भी कहा जाता है। इन्होंने अपने छोटे से जीवन काल में अपने द्वारा किए गए। कामों के कारण ऐसी प्रसिद्धि प्राप्त की जिसके कारण पूरी दुनिया इनका लोहा मानती है। और अपने किए गए इस कार्य के कारण इन्हें महापुरुष के नाम से भी जाना जाता है। आज मैं अपने इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी को महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी के जीवन के उन पहलुओं को विस्तार से बताने जा रहा हूं। जिनकी जानकारी ज्यादातर लोगों को आज नहीं है। स्वामी विवेकानंद 19वीं सदी में भारत देश के लिए कुछ ऐसे कार्य जिनसे ना केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया उन्हें स्वामी विवेकानंद के नाम से जानने लगा स्वामी विवेकानंद उन्नीसवीं सदी के भारत के सबसे बड़े विद्वान रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को ना केवल भारत देश में बल्कि भारत देश से बाहर तक फैलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद संपूर्ण विश्व में हिंदू धर्म के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान किया। स्वामी विवेकानंद ने गरीबों की सेवा के लिए और गरीबों को आगे बढ़ाने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय युवा को आगे बढ़ाने के लिए उनके जीवन में एक उमंग का नया लहर और उत्साह भर दिया। इसी कारण से आज पूरे भारत देश में स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस यानी कि नेशनल यूथ डे के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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आइए अब मैं आपको स्वामी विवेकानंद के जीवन के उन पहलुओं को विस्तार से बताता हूं। जिनकी जानकारी शायद आज हमारे युवाओं को नहीं है। जी हां जिन्हे आज पूरी दुनिया स्वामी विवेकानंद के नाम से जानती है। बचपन में उनका नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। ब्रिटिश राज्य में कोलकाता शहर में 12 जनवरी 1863 को मकर संक्रांति के दिन जन्म लिए थे। बचपन से ही इनका नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। और लोग प्यार से इन्हें नरेंद्र बुलाते थे। नरेंद्र नाथ का जन्म एक कोलकाता के बंगाली परिवार में हुआ था। और यह पारंपरिक बंगाली परिवार से संबंध रखते थे। नरेंद्र नाथ दत्त के पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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जो कि उस समय के कोलकाता उच्च न्यायालय यानी कि कोलकाता हाईकोर्ट में वकील के तरह काम करते थे। नरेंद्र नाथ दत्त के माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। जो एक धार्मिक महिला थी। और घरेलू कामकाज में ही अपना जीवन व्यतीत करती थी। कहा जाता है कि नरेंद्र नाथ की माता का भगवान के प्रति श्रद्धा शुरुआत से ही बहुत ज्यादा था। इसी कारण से वह हमेशा नरेंद्र को धार्मिक शिक्षा और धर्म के बारे में विस्तार से बताया करती थी। नरेंद्र नाथ के दादाजी संस्कृत और फारसी के बहुत बड़े विद्वान थे। कहा जाता है घर में पढ़े लिखने वाले माहौल होने के कारण शुरुआती दौर से ही नरेंद्र नाथ पढ़ाई में अव्वल आया करते थे।

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नरेंद्र नाथ ना केवल पढ़ाई में अव्वल थे। बल्कि वह बचपन में बहुत शरारत भी किया करते थे। पढ़ाई के साथ-साथ नरेंद्र नाथ दत्त खेलकूद में भी अपनी रुचि रखते थे। और खेलकूद में भी अव्वल स्थान पाते थे। पढ़ाई लिखाई और खेलकूद के साथ-साथ नरेंद्र नाथ दत्त संगीत और गायन में भी अपनी रुचि रखते थे। इसी कारण से बड़ी कम उम्र में ही नरेंद्र नाथ दत्त वाद्य यंत्रों को बजाना सीख चुके थे। यही नहीं नरेंद्र नाथ दत्त बड़ी कम उम्र में ही मेडिटेशन यानी कि ध्यान में ज्यादा रुचि रखने के कारण यह बहुत अच्छी तरह से मेडिटेशन ट्यूशन भी किया करते थे। बचपन के समय से ही नरेंद्र नाथ दत्त ईश्वर के बारे में ज्यादा जानने की इच्छा रखा करते थे।

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और दूसरे लोगों से ईश्वर के बारे में तरह-तरह के प्रश्न भी किया करते थे। ईश्वर के बारे में तरह-तरह के और विभिन्न रीति-रिवाजों के बारे में तथा जातिवाद के बारे में यह अपने बचपन से ही लोगों को अच्छी शिक्षा देना शुरू कर दिए थे। कहा जाता है। कि बचपन से ही नरेंद्र सन्यासी और संतों के प्रति बहुत अच्छे विचार रखा करते थे। यह हमेशा साधु संतों का सेवा किया करते थे। इन्हें बचपन से ही साधु संतों के प्रति बहुत ज्यादा श्रद्धा हुआ करता था। कभी किसी सन्यासी या फकीर को किसी चीज की आवश्यकता होती थी। और वह चीज नरेंद्र के पास होता था। तो निसंकोच अपने उस वस्तु को उस साधु और सन्यासी को दे दिया करते थे। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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1871 में जब नरेंद्र 8 वर्ष के थे। उनका ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूशन में दाखिला करा दिया गया। 1877 से 18 वर्ष तक उनका पूरा परिवार रायपुर में ही रहा था और यहीं से नरेंद्र ने अपने मैट्रिक की परीक्षा में पास किया। मैट्रिक के परीक्षा में पास होने के बाद नरेंद्र कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। और यहां से अपने शिक्षा की शुरुआत कर दिया। यहां पर नरेंद्र ने इतिहास का बहुत गहन अध्ययन किया और यूरोप के देशों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। 1884 में नरेंद्र ने बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री प्राप्त की नरेंद्र की आश्चर्यजनक यादाश्त के कारण उन्हें कुछ लोग इतना ज्यादा पसंद करते थे। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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कि उन्हें उनके पढ़ाई में बहुत ज्यादा मदद किया करते थे। नरेंद्र के बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनका ज्ञान भी बढ़ता जा रहा था। वह कई लोगों की तारीफ के पात्र बनते जा रहे थे। और साथ ही साथ नरेंद्र के मन में ईश्वर के अस्तित्व के बारे में जानकारी भी गहरी होती जा रही थी। इसी समय में नरेंद्र ब्रह्म समाज से जुड़े और अपने मन में उठ रहे प्रश्न के उत्तर के लिए वहां पर हो रहे प्रार्थना और भजन इत्यादि में शामिल होना शुरू हो गए। लेकिन ईश्वर के प्रति उनके मन में उठ रहे प्रश्न और उनकी जिज्ञासा यहां पर शांत नहीं हो पाया। इसी कारण से वह 1885 में दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस से मिले। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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श्री रामकृष्ण परमहंस मां काली के मंदिर के पुजारी हुआ करते थे। जब नरेंद्र पहली बार उनसे मिले तो वह बहुत परेशान नजर आ रहे थे। और अपनी आदत और जिज्ञासा व्यक्त करते हुए। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न पूछा नरेंद्र ने श्री रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न पूछा कि क्या आपने ईश्वर को देखा है। और क्या ईश्वर बिल्कुल वैसे ही हैं। जैसे हम अपने सामने अभी देख पा रहे हैं। नरेंद्र के द्वारा ऐसे प्रश्न पूछे जाने पर श्री रामकृष्ण परमहंस ऐसे व्यक्ति थे। जो जीवन में पहली बार किसी ऐसे प्रश्न से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। और वह नरेंद्र के अंदर की सच्चाई को महसूस कर पा रहे थे। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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नरेंद्र के द्वारा किए गए प्रश्न और उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए। श्री रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र से कहा कि हां मैंने ईश्वर को देखा है। उनके इस तरह के उत्तर को सुनकर नरेंद्र बहुत प्रभावित हुए। और वह श्री रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु मान लिया। 1886 को रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु हो गई। उन्होंने अपना उत्तराधिकारी नरेंद्र को बना दिया था। क्योंकि नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य में आते थे। इसी कारण से मृत्यु से पहले श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने अगले उत्तराधिकारी के रुप में नरेंद्र को चुना था। और 1886 में श्री रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद नरेंद्र को वहां का उत्तराधिकारी बना दिया गया। 1890 में नरेंद्र लंबी यात्राएं कि उन्होंने लगभग पूरे देश में भ्रमण किया। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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अपनी यात्राओं के दौरान नरेंद्र वाराणसी अयोध्या आगरा वृंदावन और अलवर आदि स्थानों पर गए। इसी भ्रमण के दौरान नरेंद्र से इनका नाम स्वामी विवेकानंद बदल दिया गया। इस नाम के बदलने के पीछे भी एक लंबी कहानी है। कहा जाता है कि नरेंद्र को यह नाम उनके भ्रमण के दौरान एक महाराज ने दिया था। अपने भ्रमण के दौरान नरेंद्र राजाओं के महलों में भी रुका करते थे। और गरीब की कुटिया में भी रुका करते थे। उनका मानना था कि सभी लोगों के साथ अलग अलग तरीके से रहने के बाद ही वह उनके बारे में विशेष जानकारी प्राप्त कर पाएंगे। यही कारण था कि जब वह राजमहल में रहा करते थे।

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तो राजाओं के जीवन से जुड़ी बातों को इकट्ठा करके उस पर चिंतन किया करते थे। दूसरी तरफ जब भ्रमण के दौरान वह किसी गरीब इंसान के यहां रहा करते थे। उनके जीवन से जुड़ी समस्याएं और सुविधाओं को इकट्ठा करके उस पर भी चिंतन किया करते थे। जब स्वामी विवेकानंद भ्रमण कर रहे थे। तो उन्हें बहुत सारी ऐसी जानकारी मिली जिससे वह बहुत दुखी हुए। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद को जब यह पता चला कि धर्म और जाति के नाम पर यहां तानाशाही की जा रही है। तो उन्होंने यह सोच लिया था। कि वह एक विकसित भारत का निर्माण करेंगे और इन सभी तरह की बुराइयों को खत्म कर देंगे। इस भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद के साथ उनका करम कुंडल और किताबें श्री भगवत गीता साथ हुआ करती थी। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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अपने इस भ्रमण के दौरान उन्होंने भीक्षा भी मांगी। 1893 में स्वामी विवेकानंद महाराज अमेरिका के शिकागो शहर पहुंचे। यहां शिकागो शहर में संपूर्ण विश्व के धर्म का सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में एक स्थान पर सभी धर्म गुरुओं ने अपने-अपने धर्म की पुस्तकें रखी। वहीं पर हमारे देश से गए स्वामी विवेकानंद महाराज ने भी अपनी एक छोटी सी किताब श्री भगवत गीता भी रखी। जिसका कुछ लोगों ने मजाक भी बनाया। वहां पर बैठे अन्य धर्मगुरुओं ने जब विवेकानंद महाराज को एक छोटी सी पुस्तक श्री भगवत गीता को रखते हुए। देखा तो इनका पूरे सम्मेलन के सामने मजाक बनाया गया। लेकिन स्वामी विवेकानंद महाराज ने इस तरफ ज्यादा ध्यान ना देते हुए। अपने भाषण को शुरूआत किया। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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जब स्वामी विवेकानंद महाराज श्री भागवत गीता के बारे में बोलना शुरू किए। तो पूरा समय वहां पर तालियों से गूंज गया था। कहा जाता है कि जब स्वामी विवेकानंद महाराज ने वहां पर अपने श्री भगवत गीता के धर्म ग्रंथ को बोलना शुरू किया। तो लगभग 2 पेज में ही उन्होंने काफी समय लगा दिया था। और उन्होंने उस पूरी सभा में कहा कि यदि मैं पूरे भगवत गीता का वर्णन करना शुरू करूं तो यहां पर सदियां कम पड़ जाएंगी। उनकी इन बातों को सुनकर वहां पर बैठे सभी लोगों ने तालियों के जोरदार गूंज से स्वामी विवेकानंद का स्वागत किया। अमेरिका जाने के बाद स्वामी विवेकानंद जी ने ना केवल शिकागो में हुए। इस आयोजन को ही फलीभूत किया। बल्कि वह मुख्य रूप से न्यूयॉर्क वाशिंगटन इत्यादि शहरों में भी अपने हिंदू धर्म का जानकारी प्रदान किया। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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लेकिन लगातार काम करने और व्यस्त जिंदगी होने के कारण। 1895 में उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा अब वह घूम-घूम कर अपने भाषण देने के तरीके को रोक दिया। और एक जगह बैठकर लोगों को कक्षाओं में क्लास देना शुरु कर दिया। कहा जाता है कि विवेकानंद जी के भाषण और लेक्चर से प्रभावित हुई। महिला मार्गरेट एलिजाबेथ ने भी स्वामी विवेकानंद को अपना गुरु मान लिया था। स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की जीवनी लिखने वाले प्रथम व्यक्ति थे। उन्होंने ज्ञान और विद्वता को देखते हुए। हॉवर्ड यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अकादमी पद पर जाने का प्रस्ताव भी दिया गया।

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लेकिन स्वामी विवेकानंद ने इन सभी पद को ठुकरा दिया। पश्चिम के देशों में लंबी भ्रमण यात्रा करने के बाद। सन 1897 में स्वामी विवेकानंद भारत वापस लौट आए। यूरोप यात्रा से वापस आने के बाद स्वामी विवेकानंद महाराज जी ने भारत में भी दक्षिण के क्षेत्रों में रामेश्वरम रामधन अधूरे कुंभकोणम और मद्रास में भी अपनी भाषण के द्वारा लोगों को प्रभावित किया। कहा जाता है कि जब भी स्वामी विवेकानंद जी जनता और राजघरानों के पास से गुजरते थे। तो उनका भव्य स्वागत किया जाता था। लेकिन लगातार अपने दिनचर्या में व्यस्त होने के कारण उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा था। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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अपने इस लंबे भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद जी के शिष्य भगिनी निवेदिता और स्वामी दयानंद की प्रमुख थे। इसी दौरान उन्होंने सैनफ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना भी की थी। और कैलिफ़ोर्निया में शांति आश्रम यानी कि वेदांत आश्रम का स्थापना किया गया था। शुरुआती दौर से ही धर्म के राह पर चलने वाले और श्री भागवतगीता के सत्यता पर आधारित इनके विचार वहां के लोगों को बहुत प्रभावित किया करता था। अपने स्वास्थ्य के लगातार गिरने के कारण अंत में इन्होंने अपना एक मठ का स्थापना किया। और बेलूर मठ में रहने लगे। और बेलूर मठ में वह तीन घंटों तक रोजाना ध्यान किया करते थे। और अपने शिष्यों के साथ संस्कृत व्याकरण का ज्ञान चारों तरफ प्रसारित किया करते थे। (स्वामी विवेकानन्द के जीवन के संघर्ष और सफलता की जानकारी)

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अपने स्वास्थ्य के लगातार गिरने के बाद भी वह अपने कामों में कभी आंच नहीं आने दिये। इसी तरह 4 जुलाई 1902 को अपनी मृत्यु के दिन वह प्रातः काल जल्दी उठे और बेलूर मठ गए। वहां 3 घंटो तक ध्यान करने के बाद उन्होंने अपने शिष्यों को संस्कृत और व्याकरण के बारे में विस्तार से बताया। और शाम के 7:00 बजे अपने कमरे में गए। और किसी को भी अंदर आने से मना कर दिया। और ध्यान में लग गए। लगभग कहा जाता है। कि 9:10 मिनट में ध्यान के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनके शिष्य के अनुसार कहा जाता है। कि स्वामी विवेकानंद ने समाधि ली थी। स्वामी विवेकानंद के मरने के उपरांत उनका अंतिम संस्कार गंगा के तट पर किया गया।

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