स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां

स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां

स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां

स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और मैं इसे लेकर रहूंगा। इन शब्दों से आप सभी को यह पता चल ही गया होगा कि आज हम भारत के एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बाद बारे में बात करने जा रहे हैं। जिनका नाम भारत के क्रांतिकारियों के सबसे ऊपर लिया जाता है। आज हम सभी भारत के महान क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक के जीवन के सभी पहलुओं को विस्तार से जानेंगे। बाल गंगाधर तिलक महात्मा गांधी के स्वंत्रता की लड़ाई के सबसे बड़े नेता माने जाते थे। जिन्हें महात्मा गांधी ने भी आधुनिक भारत के निर्माता के नाम से पुकारा था। लाला लाजपत राय ने बाल गंगाधर तिलक को भारत का शेर के नाम से संबोधित किया था। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाल गंगाधर तिलक को भारतीय क्रांति का जनक बताया था। महात्मा गांधी के क्रांति के मुद्दे भी वही होते थे। जो बाल गंगाधर तिलक पहले उठाया करते थे। जैसे स्वदेशी, स्वराज ,और शिक्षा के स्तर पर विकास बाल गंगाधर तिलक ने जाति के कारण होने वाले आपसी हिस्से का भी जमकर विरोध किया था। बाल गंगाधर तिलक ने अपनी लिखी हुई पुस्तकों में यह भी कहा है। कि यदि भगवान छुआछूत को मानता है। तो मैं उसे भगवान नहीं मानता। इनके बहुत सारे ऐसे विचार हैं। जिनके बारे में सुनकर इंसान के अंदर बहुत तरह की प्रवृत्तियों में बदलाव आना शुरू हो जाता है। साथ ही साथिया हमें जीवन को प्रेरित करने के लिए भी उपयुक्त माना जाता है।

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अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई बार बाल गंगाधर तिलक को जेल की सलाखों का सामना करना पड़ा। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था। बाल गंगाधर तिलक के पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था। बाल गंगाधर तिलक के पिता एक स्कूल के शिक्षक थे।बाल गंगाधर तिलक के पिता स्कूल में संस्कृत का ज्ञान प्रदान किया करते थे। साथ ही साथ बाल गंगाधर तिलक के पिता संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञानी भी थे। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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बाल गंगाधर तिलक की आयु जब 10 साल की थी। तभी इनके माता की मृत्यु हो गई। साथ ही साथ जब बाल गंगाधर तिलक 16 साल के हुए तो इनके पिता की भी मृत्यु हो गई। अपनी जिंदगी को परेशानियों से सामना करते हुए बाल गंगाधर तिलक जब 18 साल के हुए तो 9871 ईस्वी में इनकी शादी एक मराठी लड़की तापीबाई से कर दी गई। बाद में इनकी पत्नी का नाम बदलकर सत्यभामा रख दिया गया। शुरुआती समय से ही बाल गंगाधर तिलक को गणित बनाने में बहुत मजा आता था। और यह गणित का अच्छा जानकारी भी रखते थे।

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इसी कारण से शुरुआती दौर में बाल गंगाधर तिलक गणित के माध्यम से ही अपने आगे की पढ़ाई करना शुरू कर दिए। गणित के साथ ही उन्होंने अपने ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त करने के बाद इन्होंने m.a. की डिग्री प्राप्त करने के लिए अपना दाखिला महाराष्ट्र के एक कॉलेज में करवा लिया। लेकिन कुछ समय बाद कुछ आर्थिक परिस्थितियों के कारण इनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। और यह फिर से वकालत की पढ़ाई करना शुरू कर दिए। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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आर्थिक स्थिति सही ना होने के कारण इनके वकालत की भी पढ़ाई पूरी नहीं हुए। लेकिन उन्होंने अपने जीवन को आगे चलाने के लिए एक निजी स्कूल में ही शिक्षक की नौकरी ज्वाइन कर ली। कुछ समय तक शिक्षक की नौकरी करने के बाद इन्हें यह पता चला कि इन्हें शिक्षक की नौकरी करने से किसी प्रकार का कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सकता। इसी कारण से बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षक की नौकरी भी छोड़ दी। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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गंगाधर तिलक जी जब स्कूल की नौकरी छोड़ चुके थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्रकारिता का काम शुरू कर दिया। और यह खुद पत्रकार बन गए। बाल गंगाधर तिलक को यह लगता था। कि यदि उनको अपने देश के लिए कुछ करना है। अंग्रेजों से अपने देश की गुलामी को खत्म करना है। तो पत्रकारिता एक अहम भूमिका निभाती है। पत्रकारिता के माध्यम से वह देश के लोगो में जागरूकता फैलाना चाहते थे। ताकि भारत देश के सभी नागरिक को अंग्रेजों से किए गए और शोषण के बारे में विस्तार से पता चल सके। इसी कारण से बाल गंगाधर तिलक ने अपनी दो पत्रकारिता को प्रकाशित किया।

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मराठी में केसरी नाम की अखबार को उन्होंने प्रकाशित किया। और हिंदी में मराठा नाम के अखबार को प्रकाशित किया। यह दोनों अखबार केवल भारत देश के व्यक्तियों को जागरूकता प्रदान करने के लिए बनाया गया था। देश के शिक्षा व्यवस्था से भी बाल गंगाधर तिलक बहुत ज्यादा चिंतित रहते थे। वह हमेशा से चाहते थे कि भारत देश के सभी नागरिकों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सके। लेकिन अंग्रेजों के इस प्रकार से शोषण करने के तरीके और भारत के लोगों पर अत्याचार करने के तरीके से परेशान होकर यह हमेशा अपने अखबारों में अंग्रेजो के खिलाफ लिखा करते थे। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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बाल गंगाधर तिलक का मानना था। कि जो शिक्षा अंग्रेजो के द्वारा भारतीयों को प्रदान किया जा रहा है। इससे भारतवासी को किसी प्रकार से कोई लाभ प्राप्त नहीं हो सकता है। यह सभी शिक्षा कहीं ना कहीं अंग्रेजों को ही लाभान्वित करेगा। और साथ ही साथ बाल गंगाधर तिलक यह समझ चुके थे। कि अंग्रेजो के द्वारा दिया गया शिक्षक अंग्रेजों को लंबे समय तक भारत पर राज करने के लिए प्रेरित करेगा। और समय-समय पर इसी कारण से बाल गंगाधर तिलक अपने द्वारा प्रकाशित किए गए अखबारों में इसके खिलाफ बोला करते थे। अंग्रेजों के खिलाफ और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बोलने के कारण कई बार बाल गंगाधर तिलक को जेल भी जाना पड़ा। पूरे जिंदगी अपने कठिनाइयों का सामना करते हुए बाल गंगाधर तिलक ने कभी हार नहीं मानी और स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। के नारे चारों तरफ फैलाते रहे। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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इसी कारण से बाल गंगाधर तिलक अपने दोस्तों के साथ मिलकर डेक्कन सोसायटी का गठन किया। जिसका काम भारत के नागरिकों को शिक्षित करना और स्वराज का मांग करना था। अपने द्वारा प्रकाशित किए गए अखबार में बाल गंगाधर तिलक लोगों को शिक्षित करते थे। साथ ही साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जागरूक करते थे। इसी कारण एक बार बाल गंगाधर तिलक को अंग्रेजी सरकार ने 18 महीने के लिए जेल में बंद कर दिया। लेकिन जेल में जाने के बाद भी इन्होंने अपनी एक किताब को प्रकाशित किया। अंग्रेजो के खिलाफ बोलने के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें हत्या को उकसाने के आरोप में 18 महीने की सजा कर दी।लेकिन बाल गंगाधर तिलक को 18 साल की सजा काट के आने के बाद एक राष्ट्रीय नेता की तरह सम्मान मिलने लगा। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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1890 में बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस के सरकार को ज्वाइन किया। और स्वराज की मांग करना शुरू कर दिया। साथ ही साथ 1905 में अन्य नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने स्वराज का मांग करने के लिए जगह जगह पर इकट्ठे होने लगे। और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। अंग्रेजों का जमकर विरोध करना शुरू कर दिया। लेकिन कांग्रेस पार्टी के अंदर मौजूद कुछ लीडर से यह बिल्कुल खुश नहीं थे। अलग अलग लोगो का विचार वह पे अलग अलग तरीके का होता था। जैसा कि हम सभी जानते हैं। कि एक पार्टी के अंदर सभी लोगों का मत एक जैसे नहीं हो सकता इसी प्रकार से कांग्रेस के इस पार्टी में भी कुछ गरम दल थे। और कुछ नरम दल थे। जिससे बाल गंगाधर तिलक खुश नहीं थे। उनका मांग तो सिर्फ स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे ही था। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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सबसे हैरान कर देने वाली बात यह मानी जाती है। कि पार्टी के अंदर कोई भी गलत सोचने वाला व्यक्ति नहीं था। एक तरफ शांत दल और एक तरफ गरम दल जहां एक तरफ गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेता थे। जो उस समय यह मानते थे। कि यदि हम अभी भारत को अंग्रेजो के खिलाफ खड़ा कर ले तो भारत देश अभी इसके लिए उपयुक्त समय और तैयार नहीं है। हो सकता है कि अचानक से अंग्रेजों के खिलाफ भारत देश को खड़ा करने के कारण सब कुछ बर्बाद हो जाए। सब कुछ तहस-नहस हो जाए। इसी कारण से राम कृष्ण गोखले हमेशा से सामने सामने की लड़ाई से दूर रहा करते थे। लेकिन दूसरी तरफ बाल गंगाधर तिलकजो गरम दाल के नेता थे। उनका यह मानना था। कि बिना खून बहाए हमें आजादी नहीं मिल सकती। कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना पड़ेगा।

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बंगाल के विभाजन के बाद दोनों गुटों में तनाव बढ़ गया। और 1907 में कांग्रेस की सूरत की मीटिंग में नए प्रेसिडेंट के चुनाव को लेकर बहस हो गई। और नरम दल और गरम दल दोनों अलग हो गए। दूसरी तरफ दो बंगाली लोगों ने कोलकाता के मजिस्ट्रेट को मारने के लिए बम फेक दिया। इसमें से एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। और दूसरे व्यक्ति को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इसमें बाल गंगाधर तिलक ने जमकर विरोध किया और बंगाल के क्रांतिकारियों का सपोर्ट करना शुरू कर दिया। इस प्रकार से समर्थन मिलने के बाद क्रांतिकारी लहर और ज्यादा तेज हो गई। बाल गंगाधर तिलक ने इन सभी क्रांतिकारियों का समर्थन करने के बाद अपने केसरी अखबार में स्वराज की मांग करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ लिख दिया। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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इसी कारण से 1989 में फिर से बाल गंगाधर तिलक को जेल में डाल दिया गया। अंग्रेजों ने इन्हें आतंक फैलाने के कारण 6 साल की सजा दे दी। बाल गंगाधर तिलक ने जेल में रहने के बावजूद भी एक किताब की रचना की जेल में गीता रहस्य पुस्तक को लिखा हुआ। उसकी कई पुस्तके बिक चुकी थी। आजादी की लड़ाई कि कई बार बाल गंगाधर तिलक ने महात्मा गांधी को भी अहिंसा के रास्ते को छोड़कर और अपने साथ आने को कहा। लेकिन उनके सभी प्रयास असफल साबित हुए। 1916 ईस्वी में बाल गंगाधर तिलक ने होमरूल लीग की स्थापना की जिसका एकमात्र लक्ष्य स्वराज था।  इसी कारण से लोगों के भीड़ इकट्ठा करने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव और शिवाय उत्सव की स्थापना की। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग की भीड़ इकट्ठा हो सके। और उनके द्वारा दिया गया जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास पहुंच सके।

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बाल गंगाधर तिलक की उपलब्धियों में बाल विवाह के ऊपर रोक लगाने की मांग और शराब के ऊपर रोक लगाने की मांग की गई। बाल गंगाधर तिलक ने बाल विवाह का जमकर विरोध किया था। साथ ही साथ भारत में मदिरापान और धूम्रपान जैसी समस्याओं पर भी जमकर विरोध किया था। बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि महान उपलब्धियां कभी आसानी से प्राप्त नहीं होती और यदि कोई उपलब्धियां आसानी से प्राप्त हो जाए तो कभी वह महान नहीं होती ऐसे महान विचार रखने वाले बाल गंगाधर तिलक ने अपने जीवन में बहुत सारे कष्टों का सामना करते हुए भारत को आजादी दिलाने के लिए प्रेरित थे। और वह कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखते थे। हमेशा अपने स्वराज की मांग को लेकर कष्टों को झेलते रहते थे। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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भारत के महान क्रांतिकारी 1 अगस्त 1920 को स्वर्ग प्राप्त कर गए। भारत देश में शोकाकुल माहौल छा गया और लाखों लाख लोगों ने इनको श्रद्धांजलि दी। बाल गंगाधर तिलक के जीते जी तो नहीं लेकिन इनके मरणोपरांत 27 साल बाद इनकी इच्छा पूरी हुई। और भारत को स्वराज प्राप्त हो गया। बाल गंगाधर तिलक पूरे जीवन के प्रयास के कारण भारत को आजादी मिली। (स्वराज रचयिता बाल गंगाधर तिलक के जीवन और उपलब्धियां)

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