वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष

वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष

वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष

साहस स्वाभिमान आत्मविश्वास ज्ञान और बहादुरी की मिसाल वीर भगत सिंह जो भारत देश के एक बहुत बड़े महान क्रांतिकारी साबित हुए थे। 22 साल की छोटी उम्र में ही देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए इन्होंने हंसते-हंसते फांसी तक को कबूल कर लिया था। इसी बात से यह अनुमान लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा कि वीर भगत सिंह के अंदर कितनी साहस और देश के प्रति प्यार था। आज मैं आप सभी को वीर भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसे तथ्य को विस्तार से बताने जा रहा हूं। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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जिसका अनुमान शायद ही कोई भारतवासी लगा पाएगा। ऐसे तो हम सभी वीर भगत सिंह के बारे में जानते हैं। लेकिन आज उनके जीवन से जुड़ी मै उन सच्चाइयों को बताने जा रहा हूं। जो उन्होंने अपने देश के लिए किया आज इस पोस्ट के माध्यम से मैं ना केवल सिर्फ वीर भगत सिंह के साहस का वर्णन करने जा रहा हूं। बल्कि यदि आप इस पोस्ट को पूरी तरह पढ़ेंगे तो आपके जीवन में भी अच्छे प्रेरणादायक विचार आपको प्रेरित करेंगे। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि भारत देश अंग्रेजों की गुलामी का शिकार था। ऐसे ही समय में 28 सितंबर 1907 को पंजाब प्रांत के जिला लालपुर में वीर भगत सिंह का जन्म हुआ था। अभी यह जगह पाकिस्तान के हिस्से में आता है। लेकिन जब वीर भगत सिंह का जन्म हुआ था। यह भारत हुआ नकारता था। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। और भगत सिंह के माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह भी एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। और भारत के आजाद करवाने में पूरा समर्थन देते थे। इसे सब करने ये भी अच्छे क्रांतिकारी  माने जाते थे। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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ऐसा कहा जाता है। कि वीर भगत सिंह के घर में सभी लोग बड़े ही हिम्मती और साहसी थे। वीर भगत सिंह भी अपने परिवार वालों की तरह बचपन से ही बहादुर साहसी और निडर थे। उनकी हिम्मत को देखकर उनके बड़ी उम्र वाले बच्चे भी वीर भगत सिंह से उलझने का हिम्मत नहीं करते थे। कहां जाता है कि एक बार वीर भगत सिंह अपने पिता के साथ अपने गांव के पास एक खेत में घूमने गए। जब वह वहां अपने पिता के साथ पहुंचे। तो अपने पिता से वीर भगत सिंह ने प्रश्न किया कि पिताजी आप इस खेत में क्या करते हैं। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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भगत सिंह के पिता अपने पुत्र की यह बात सुनकर थोड़े से मुस्कुराए और उन्होंने वीर भगत सिंह को कहा कि इस खेत में बीज डालकर अनाज उगाता हूं। अनाज होने के बाद हमारे परिवार का खाना पीना इसी अनाज पर निर्भर होता है। वीर भगत सिंह की आयु उस समय बहुत कम थी। लेकिन अपने पिता के द्वारा सुने इस बात से वीर भगत सिंह ने फिर से अपने पिता से यह प्रश्न किया। कि आप अपने खेतों में बीज क्यों बोते हो। आप अपने खेतों में बंदूके क्यों नहीं बोते हो। यदि आप अपने खेतों में बंदूके बोओगे तो हमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने में आसानी होगी।

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जैसा कि आप खेत में बीज बोने के बाद बहुत सारे अनाजों की कटाई करते हो। वैसे ही यदि हम बंदूक बोएंगे तो हमारे पास बहुत सारे असला और बारूद होंगे। जिससे हम जमकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठा सकेंगे। और उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर कर सकेंगे। अपने पुत्र की आवाज सुनकर उनके पिता को बड़ी हैरानी हुई। लेकिन कहीं उनके पिता के मन में खुशी भी थी। कि वह अपने देश के लिए कुछ करना चाहता है। और अपने परिवार वालों की तरह आगे जाकर यह भी अपने देश के लिए कुछ करेगा। जैसा की मैंने आप सभी को पहले भी बताया है कि वीर भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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अपने पुत्र के इस तरह के विचार से वह बहुत प्रभावित हुए और वीर भगत सिंह को यह समझाया कि यह संभव नहीं है। खेतों में सिर्फ बीज ही उगाया जाता है। बंदूके नहीं यह बात सुनकर वीर भगत सिंह को बहुत आश्चर्य हुआ। और उन्हें निराशा भी हुई। वह सोचते थे कि काश उनके खेतों में बंदूकें उगाई जाती तो उनके पास बहुत सारे बंदूके होती। जिससे अंग्रेजी हुकूमत को धूल चटा पाते अपने बचपन के समय से ही वीर भगत सिंह को अपने देश के प्रति बहुत ज्यादा प्यार था। वह अपने देश को अंग्रेजों से आजाद करवाने के लिए बचपन से ही प्रेरित थे। लेकिन 13 अप्रैल सन 1919 को वीर भगत सिंह के जीवन में एक ऐसा समय आया। जिसने वीर भगत सिंह का आत्मा को झकझोर कर रख दिया। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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वीर भगत सिंह के मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इतना आक्रोश भर गया कि उन्होंने उसी दिन यह संकल्प ले लिया था। कि वह भारत देश से अंग्रेजों को हमेशा हमेशा के लिए भगा कर दम लेंगे। 13 अप्रैल सन 1919 को भारत के इतिहास का सबसे क्रूर नरसंघार हुआ था। इस दिन पंजाब प्रांत के अमृतसर शहर के स्वर्ण मंदिर के निकट स्थित जलियांवाला बाग में हुआ हत्याकांड वीर भगत सिंह के जीवन में एक ऐसा मोड़ लाया। जिससे वीर भगत सिंह के जीवन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आक्रोश और नफरत पैदा कर दिया। इस दिन जलियांवाला बाग में कुछ हिंदू अपने भारत देश में हो रहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक वार्तालाप कर रहे थे।(वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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जिसमें हजारों की संख्या में लोग जमा हुए थे। लेकिन अचानक अंग्रेजी हुकूमत के एक बड़े अधिकारी जनरल डायर ने रौलट एक्ट के विरोध में हो रहे इस सभा को बिना किसी चेतावनी और बिना किसी को कोई  बात को समझाएं हुए ही इन पर गोली चलवा दी थी। जनरल डायर ने इस भीड़ में खड़े हजारों बेकसूर ऊपर ऐसी गोलियां चलवा दी। जैसे किसी भेड़ बकरियों को काटा जा रहा हो।  ऐसे तो कहा जाता है कि इस भीड़ में मरने वालों का आंकड़ा 1000 से कुछ ज्यादा था। लेकिन सच्चाई आज तक किसी को पता नहीं चला। ऐसा माना जाता है कि इस भीड़ में मरने वालों की संख्या 6 से 7 हजार तक थी।

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लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने इसे बस 1000 लोगों के मृत्यु होने का आंकड़ा बताते हुए इस केस को बंद कर दिया। जब यह बात वीर भगत सिंह को पता चली तो वह अपने घर से लगभग 20 किलोमीटर पैदल चलकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास जहां यह हत्याकांड हुई थी। जलियांवाला बाग पहुंच गए। जब वह जलियांवाला बाग पहुंचे। तो वहां की निर्मम हत्या और दर्दनाक मंजर को देख कर बहुत दुखी हो गए। उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इतनी नफरत हो चुकी थी। कि वह नफरत अब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक विस्फोटक का काम करने जा रही थी। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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जब वीर भगत सिंह जलियांवाला बाग से वापस आ रहे थे। तो उन्होंने वहां से खून से सनी एक मुट्ठी मिट्टी अपने पास रख लिया। और उस मिट्टी के साथ वापस 20 किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर पहुंचे। हालांकि वीर भगत सिंह की आयु इस समय कुछ ज्यादा नहीं थी। वह केवल 12 साल के ही थे। इसी समय में दूसरी तरफ महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन भी शुरू कर दिया था। जिसके अनुसार उन्होंने सभी भारतवासी को यह कहा कि ब्रिटिश सरकार की नौकरियां छोड़ दे। मजदूर फैक्ट्रियों में काम करना बंद कर दें। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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बच्चों को सरकारी स्कूल में जाने से मना कर दिया। और ब्रिटिश सरकार के द्वारा बनाई जाने वाली सभी कपड़ों का बहिष्कार करें। और उन्हें जला दें महात्मा गांधी यह चाहते थे। कि ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई सभी चीजों के बहिष्कार करने से शायद ब्रिटिश सरकार की आर्थिक स्थिति भारत देश में कमजोर हो जाएगी। इसी कारण से महात्मा गांधी ने पूरे भारत में असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया। हालांकि इस समय वीर भगत सिंह की आयु मात्र 12 साल की थी। लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी के द्वारा चलाए गए आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

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कहा जाता है कि महात्मा गांधी के द्वारा चलाए गए इस असहयोग आंदोलन में वीर भगत सिंह ने पूरे देश में महात्मा गांधी के साथ महात्मा गांधी का सहयोग किया। यहां तक कि ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए पुस्तकों को भी वीर भगत सिंह ने मात्र 12 साल की आयु में ही जलाकर खाक कर दिया था। जब यही असहयोग आंदोलन महात्मा गांधी के समर्थकों ने गोरखपुर जिले में चोरा चोरी नामक स्थानों पर किया। उसी समय वहां के अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें रोकने की कोशिश की और इनके जुलूस को आगे बढ़ने नहीं दिया। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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वहां के स्थानीय लोगों में इतना क्रोध आ गया कि उन्होंने वहां के आसपास के सभी थानों में आग लगा दिया। जिसमें एक थानेदार और लगभग 33 सिपाहियों की मृत्यु हो गई। जब यह बात महात्मा गांधी को पता चला तो वह बहुत घबरा गए। कहा जाता है कि इस तरह के हिंसक प्रवृत्ति के कारण महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। और उन्होंने कहा कि अभी हमारा भारत देश स्वतंत्रता के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। गांधीजी के इस तरह अचानक असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद भी भगत सिंह के मन में बहुत ज्यादा परेशानी उत्पन्न होने लगी। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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क्योंकि आप सभी जानते हैं। कि वीर भगत सिंह शुरुआती दौर से ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ थे। लेकिन अचानक महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने पर वीर भगत सिंह के मन में गांधीजी के प्रति बहुत रोष उत्पन्न हो गया। लेकिन पूरे राष्ट्र की तरह वह भी महात्मा गांधी का सम्मान करते थे। इसी कारण उन्होंने महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन की जगह अपना हिंसक क्रांति का मार्ग अपनाना उचित समझा। हालांकि उन्होंने महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन वापस लेने से पहले कई बार समझाया भी लेकिन महात्मा गांधी उनकी एक न सुनी और अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

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इसके बाद वीर भगत सिंह ने उस समय के बहुत चर्चित क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद सुखदेव राजगुरु इन सभी को मिलाकर एक अपना क्रांतिकारी दल निर्माण किया। कहा जाता है कि अपने इन सभी क्रांतिकारी दोस्तों के साथ जब वीर भगत सिंह ने अपना क्रांतिकारी दल का आयोजन किया तो इन्हें अपने क्रांतिकारी दलों के लिए कुछ बंदूकों की आवश्यकता थी। और बंदूक खरीदने के लिए वीर भगत सिंह को पैसे की आवश्यकता थी। इसी कारण उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने के इरादे से और अपने दोस्तों को हथियार दिलाने के इरादे से ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूट के ऐतिहासिक घटना साबित किया। जिससे आज हम काकोरी कांड के नाम से जानते हैं।

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काकोरी कांड में पकड़े गए क्रांतिकारियों में से 4 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। और 16 क्रांतिकारियों को 4 साल की कैद की सजा सुनाई गई। और बाकी सभी बचे क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास का सजा सुनाया गया। जब इन्हें इस तरह की सजा सुनाई गई तब वीर भगत सिंह के मन में बहुत आक्रोश आया। और उन्होंने अपने दल का नाम बदलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में तब्दील कर दिया। उनका नया नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन था। अब ऐसा दौर आ गया था। कि वीर भगत सिंह के दल में भी दूसरे क्रन्तिकारी बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए बिल्कुल तैयार बैठे थे। 30 अक्टूबर 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार में वीर भगत सिंह और उनके दल के सभी क्रांतिकारियों ने विशाल प्रदर्शन किया। और इसी प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय के सर पर लाठी मारकर इन की निर्मम हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि जब अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही लाला लाजपत राय के सर पर लाठियों से प्रहार कर रहे थे। तो लाला लाजपत राय ने कहा कि तुम्हारे बरसाई हुई एक एक लाठी तुम्हारे अंगेरजी हुकूमत के लिए कील का काम करेगा। 17 नवंबर 1928 में लाला लाजपत राय को लाठी की चोट की वजह से मौत का शिकार होना पड़ा।

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लेकिन लाला लाजपत राय के मरने के बाद सभी क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत को सबक सिखाने की एक योजना बनाई। 28 दिसंबर 1928 को लाला लाजपत राय की निर्मम हत्या के बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने उस अंग्रेजी हुकूमत के उस ऑफिसर को गोली मारकर हत्या कर दी। जिन्होंने लाला लाजपत राय के ऊपर लाठियां बरसाई थी। गोली मारने के बाद चंद्रशेखर आजाद वहां से भाग निकले। और इस तरह से उन्होंने लाला लाजपत राय जी के ऊपर हुए अत्याचार का बदला ले लिया।इसी समय वीर भगत सिंह ने अपने बाल और दाढ़ी कटवा ली थी। ताकि अंग्रेजी हुकूमत के सिपाही उन्हें आसानी से पहचान न सके। जिस समय हमारा भारत अंग्रेजों के अधीन था। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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उस समय हमारे भारत के मजदूर की जीवन बद से बदतर होते जा रहे थे। हम सभी जानते हैं कि अंग्रेजी हुकूमत हमारे भारत देश के मजदूरों से उगाए गए अनाज पर ही निर्भर थे। लेकिन उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था। कि वहां के मजदूर किस हालत में जी रहे हैं। अंग्रेजी हुकूमत का मानना था। कि वह ज्यादा से ज्यादा मात्रा में भारत से कीमती और उपयोगी वस्तुओं को उठाकर इंग्लैंड ले जा सके। उन्हें यहां पर किसी भी तरह का कोई सुविधा हमारे भारतवासियों के लिए मुहैया नहीं करवाया था। लेकिन जब वीर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को अपने भारत देश के मजदूरों की हालत देखकर बहुत आक्रोश आया। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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वीर भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में 8अप्रैल 1929 को बम फेंक के यह साबित कर दिया कि यदि अंग्रेजी हुकूमत हमारे मजदूरों के खिलाफ कोई भी अत्याचार करेगा तो उनका जवाब ऐसे ही दिया जाएगा। हालांकि जब हमारे देश के क्रांतिकारियों ने एसेम्बली में बम फेंका था। तो उनका कोई खास इरादा किसी के भी जीवन को क्षति पहुंचाने का नहीं था। इसी कारण से बम बनाने के समय में उसमें कोई ऐसा विस्फोटक उपयोग में नहीं लाया गया था। जिससे ज्यादा जान माल की क्षति हो। उन्हें बस अंग्रेजी हुकूमत को यह दिखाना था। कि वह हमारे देश के मजदूरों के लिए अच्छी से अच्छी सुविधाएं मुहैया करवाएं। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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बम फेंकने के बाद वीर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अपनी गिरफ्तारी दी। क्योंकि भगत सिंह ने यह निश्चय कर लिया था। कि उनका जीवन उतना जरूरी नहीं है। जितना भारतवर्ष के नागरिकों की आजादी जरूरी है। वीर भगत सिंह यह चाहते थे। कि पूरे देश को यह पता चल सके कि अंग्रेजी हुकूमत किस तरह से हमारे देशवासियों पर अत्याचार कर रहे है। और हमारे ही सामान लूट के हमें किस तरह से यहां पर जलील किया जा रहा है। पुलिस के गिरफ्तारी के बाद जब वीर भगत सिंह और उनके साथियों को वहां के स्थानीय जेल में रखा गया।

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जेल में आने के बाद उन्होंने वहां पर बहुत भेद-भाव देखा। कहा जाता है कि स्थानीय जेल में अंग्रेजी हुकूमत के लिए और भारत वासियों के लिए बहुत अलग अलग तरह की सुविधाएं थी। जहां पर अंग्रेजी हुकूमत से आए हुए बंधक को सभी तरह की सुविधाएं मुहैया कराई जाती थी। वहीं पर भारतवर्ष के लोगों के लिए किसी भी तरह के सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा था। अंग्रेजों के लिए वहां पर कॉपी किताब अखबार आदि सभी सुविधाएं उपलब्ध थी। वहीं पर उन्हें अच्छा खाना भी दिया जाता था। लेकिन भारतवासी के लिए ना तो खाने का प्रबंध किया जाता था।

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और ना ही अच्छे कपड़े या कलम कॉपी किताब दिया जाता था। जब भी भगत सिंह ने ऐसी हालत देखी तो उन्होंने यह ठान लिया कि वह यहां पर सत्याग्रह करेंगे। इसी कारण से वीर भगत सिंह और उनके साथी जो वहां पर कैदी बन कर आए थे। खाना त्याग दिया। भगत सिंह के साथियों ने भी उनका साथ दिया। भूख हड़ताल के दौरान वीर भगत सिंह और उनके साथियों को तरह-तरह के प्रताड़नाएं दी जाती थी। इन्हें बुरी तरह से पीटा जाता था। इन्हें बर्फ के सिलियो पर लिटा कर घंटो छोड़ दिया जाता था। इन्हें जबरदस्ती इनके मुंह में दूध डाला जाता था।

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लेकिन कहा जाता है कि वीर भगत सिंह अपने इरादे के बहुत पक्के थे। उन्होंने अपने भूख हड़ताल के दौरान एक भी बूंद दूध अपने अंदर नहीं जाने दिया। भले ही उन्हें तरह-तरह की प्रताड़ना सहनी पड़ी लेकिन वीर भगत सिंह और उनके साथियों ने अपना भूख हड़ताल जोर-शोर से जारी रखा। दूसरी तरफ वीर भगत सिंह के दूसरे साथी सुखदेव और राजगुरु को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। भूख हड़ताल के दौरान ही वीर भगत सिंह और उनके साथी को लाहौर जेल में शिफ्ट किया गया। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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जहां इनके दूसरे अन्य साथी को भी रखा गया था। जब राजगुरु और सुखदेव को वीर भगत सिंह की भूख हड़ताल के बारे में पता चला। तो उन्होंने भी वीर भगत सिंह की भूख हड़ताल में शामिल होकर उनका जम के सहयोग किया। लाहौर जेल में भी इन सभी क्रांतिकारियों के साथ बड़ा बुरा सलूक किया जाता था। इन्हें पानी तक नहीं दिया जाता था। पानी के घरे में इन्हें दूध दे दिया जाता था। ताकि यह तड़प तड़प के अपने भूख हड़ताल को तोड़ दे। लेकिन यह अपने विचार और भूख हड़ताल के प्रति इतने सुदृढ़ थे।

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इन्होंने कभी भी एक बूंद दूध और अन्न का ग्रहण नहीं किया। वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों की भूख हड़ताल से पूरे भारत देश में हड़कंप मच गया था। अंग्रेजी सरकार को उनके सामने घुटने टेकने पड़े। अंग्रेजी सरकार को वीर भगत सिंह की सारी शर्तें को मानना पड़ा। शायद आप लोगों को यह पता नहीं होगा कि वीर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अपनी भूख हड़ताल पूरे 63  दिन तक रखा। आप सभी सोच सकते हैं कि 63  दिन के भूख हड़ताल में इन्हें किस किस तरह की प्रताड़ना सहनी पड़ी। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों ने कभी भी अंग्रेजी हुकूमत की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। 26 अगस्त 1930 को अदालत में वीर भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 406 तथा आईपीएस की धारा 138 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया गया। 7 अक्टूबर 1930 को वीर भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दी गई। और बाकी सभी क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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अदालत के हिसाब से 24 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फांसी देने का दिन तय किया गया। हलाकि वीर भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव की फांसी की खबर पूरे भारत देश में फैल चुकी थी। और यह खबर फैलते ही पूरे देश में आक्रोश जल चुका था। इसी कारण से अंग्रेजी हुकूमत ने वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 को ही फांसी देने का फैसला किया। जब वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों को फांसी के लिए ले जाया जा रहा था। तो वीर भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव गाना गा रहे थे। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

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कहा जाता है कि इनके चेहरे पर थोड़ी भी सिसक और डर नहीं दिखाई दे रहा था। और यह बड़े जोर से इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए फांसी के तख्ते की तरफ बढ़ रहे थे। 23 मार्च 1931 को शाम के समय लगभग 6:30 पर वीर भगत सिंह सुखदेव राजगुरु को फांसी दे दी गई। हालांकि ज्यादातर लोगों का मानना है कि वीर भगत सिंह के फांसी देने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल चुका था। सभी लोग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग करने के लिए तैयार थे। वीर भगत सिंह के साथी क्रांतिकारियों को फांसी देने के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने जेल के पीछे दीवारों को तोड़कर की लाश को बाहर निकाला। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

और कुल्हाड़ी के मदद से इन के छोटे-छोटे टुकड़े किए। और पास के ही जंगल में ले जाकर मिट्टी तेल की मदद से उनकी लाशों को जलाने कीकोशिस किया। लेकिन जब जंगलों में आग जलनी शुरू हुई तो आस-पास के गांव वालों को यह शंका हो गई की जंगलों में कुछ गड़बड़ चल रही है। इसी कारण से आसपास के सभी गांव वाले एकट्ठा होकर जंगल की तरफ बढ़ना शुरू हो गए। जब पास के गांव वाले जंगलों की तरफ बढ़ना शुरू हुए तो अंग्रेजी हुकूमत उनके पार्थिव शरीर को आधा जला छोड़कर ही इनके शरीर को सतलुज नदी में फेंक दिया। (वीर भगत सिंह और उनके साथी क्रन्तिकारी के जिन्दादिली संघर्ष)

जब गांव वाले वहां पहुंचे तो उन्होंने वीर भगत सिंह और उनके साथ के क्रांतिकारी के शरीर के टुकड़े को इकट्ठा करके विधिवत संस्कार किया। वीर भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव हंसते-हंसते फांसी चढ़ गए। लेकिन आज भी इनके किए गए कारनामे हमेशा हमारे दिल में जिंदा रहेंगे । आज हम भारत देश के आजाद भारत में सांस लेते हैं। तो कहीं न कहीं यह कहा जाता है कि हमारे देश के लिए बहुत सारी कुर्बानी दी गई थी।

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