फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 ईस्वी को गोविंदपुरा पंजाब में हुआ था। मिल्खा सिंह के जन्म के समय में भारत और पाकिस्तान दोनों एक साथ एक ही देश थे। अभी के समय में गोविंदपुरा है जो उस समय पंजाब के दायरे मैं आता था। वह अभी के समय में पाकिस्तान में स्थित है। अतः बहुत सारे लोगों का यह भी मानना है कि मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान में हुआ था। सारे लोग इस सच्चाई से अनभिज्ञ हैं कि जब मिल्खा सिंह का जन्म हुआ था तो भारत और पाकिस्तान दोनों एक साथ एक ही देश हुआ करते थे। (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )

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भारत पाकिस्तान के विभाजन के समय में अफरा-तफरी मैं मिल्खा सिंह ने अपने माता पिता को खो दिया। जब भारत और पाकिस्तान का बटवारा हो रहा था। इस दौरान मुसलमानों के बीच एक युद्ध छिड़ गया था। इसी युद्ध में मिल्खा सिंह ने अपने माता पिता को खो दिया। भारत पाकिस्तान के बटवारे के बाद जो दंगे शुरू हुए इस कारन से पाकिस्तान से सभी हिंदुओं को भारत लाया जा रहा था। अपने माता पिता को खो देने के बाद उसी भीड़ में ट्रेन के सहारे भारत आ गए। माता और पिता के खो देने के बाद मिल्खा सिंह के जीवन में एक बड़े भाई और बहन थी। अपने बड़े भाई और बहन के साथ मिल्खा सिंह भारत में शरणार्थी के रूप में आ गए।

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ऐसे तो मिल्खा सिंह का जन्म 20 अक्टूबर 1929 को माना जाता है। लेकिन दस्तावेजों के हिसाब से जब मिल्खा सिंह का जन्म देखा गया तो इनका जन्म 17 अक्टूबर 1935 बताया जा रहा है। अतः यह अनुमान लगाना बहुत कठिन साबित हो सकता है कि मिल्खा सिंह का वास्तविक जन्म दिनांक कौन सा है। मिल्खा सिंह अपने माता-पिता की एकलौते संतान नहीं थे। मिल्खा सिंह अपने माता-पिता के पंद्रहवें संतान के बाद पैदा हुए थे। (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )

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लेकिन बाल्यकाल में इनके सभी भाई बहन का देहांत हो गया था। शुरुआती दौर में जब मिल्खा सिंह भारत आए तो यहाँ अपनी शादीशुदा बहन के यहां दिल्ली में रहने लगे। अपने माता-पिता के खो जाने का दर्द अभी इनके सीने में जल ही रहा था। अपने बहन के यहां रहने के बाद भी अपने बहन के पति  से इन्हें तरह-तरह की प्रताड़ना सहनी पड़ती थी। लेकिन मिल्खा सिंह की उम्र अभी बहुत कम थी इसलिए वह सभी प्रकार की प्रताड़ना ही सहते रहे।

कुछ दिनों के बाद मिल्खा सिंह अपने बहन के यहां से शरणार्थियों के लिए बनाई गई एक शिविर में रहने लगे। पाकिस्तान से जो भी हिन्दू  भारत आ रहे थे उनके लिए भारत सरकार ने उस समय में एक शिविर का निर्माण किया था। इस शिविर में सभी शरणार्थियों को रहने के लिए और खाने के लिए भोजन मुहैया कराया जाता था। किसी शिविर में जाकर अपना गुजर बसर करने लगे। यह शिविर भारत सरकार के द्वारा शहादरा जो दिल्ली में स्थित है वहां पर लगाई गई थी। बड़ी परेशानियों के साथ अपने जिंदगी का गुजर बसर करते हुए मिल्खा सिंह अपने जीवन की शैली को आगे बढ़ा रहे थे।

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अपने बड़े भाई मलखान सिंह के कहने पर मिल्खा सिंह सेना की नौकरी के लिए भी कोशिश की। लेकिन पहली कोशिश में मिल्खा सिंह असफल रहे। लेकिन मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में आगे बढ़ने से हार नहीं मानी और वह फिर से दूसरी कोशिश में जुड़ गए। इस बार की कोशिश में भी मिल्खा सिंह को हार का सामना करना पड़ा। दूसरे कोशिश के बाद मिल्खा सिंह ने अपने जीवन के लक्ष्य से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपनी मेहनत और ज्यादा बढ़ा दी और फिर से सेना में भर्ती होने के लिए तैयारी करने लगे। जब मिल्खा सिंह ने सेना की नौकरी के लिए तीसरी बार कोशिश की। (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी)

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तो आप सब को यह बात जानकर बड़ी हैरानी होगी कि तीसरी बार भी मिल्खा सिंह को सेना की नौकरी में असफलता हाथ लगी। लेकिन मिल्खा सिंह ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था कि उन्हें सेना में भर्ती होना ही है। मिल्खा सिंह के जीवन में बहुत सारे ऐसे समय दुख और कष्ट आए जिसमें मिल्खा सिंह का मन विचलित हो सकता था। लेकिन दिल संकल्प और दृढ़ निश्चय मिल्खा सिंह को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। अब चौथी बार मिल्खा सिंह ने फिर से सेना की नौकरी के लिए कोशिश किया। वह सफल भी रहे। सन 1951 में मिल्खा सिंह चौथी बाद में सेना की भर्ती में सफल हो गए। जैसा कि आप सभी जानते हैं मिल्खा सिंह जब पाकिस्तान से भारत आए उनके पास किसी भी तरह का कोई पैसे का स्रोत नहीं था।

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सरकार द्वारा संचालित एक शिविर में अपना जीवन यापन कर रहे थे। वह दिल्ली के एक स्कूल में जाने के लिए 10 किलोमीटर पैदल रोज आया जाया करते थे। इसी कारण से मिल्खा सिंह बचपन से ही स्वास्थ्य थे। यही एक कारण था कि जब वह सेना में चौथी बार भर्ती होने के लिए रेस में शामिल हुए। तो वहां पर छठे स्थान को प्राप्त हुए। इनकी फुर्ती और इनके दौड़ने की साहस को देखकर ही सेना के बड़े अफसरों ने इन्हें खेलकूद की ट्रेनिंग के लिए चुनाव किया (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )

सेना में नौकरी मिल जाने के बाद मिल्खा सिंह ने सेना की नौकरी में कड़ी से कड़ी मेहनत की। इन्होंने सेना की नौकरी के दौरान 200 मीटर और 400 मीटर की रेस में खुद को जीत दिलाई। सेना में 200 से 400 मीटर की जीत के बाद मिल्खा सिंह का नाम ऊपर उड़ने लगा। मिल्खा सिंह 1956 में मेलबोर्न ओलंपिक खेलों में भी 200 से 400 मीटर की रेस में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। लेकिन शुरुआती दौर में मिल्खा सिंह को किसी भी तरह का कोई अनुभव नहीं था। इसी कारण से अंतरराष्ट्रीय लेवल पर मिल्खा सिंह को सफलता नहीं मिल पाई।

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लेकिन जब उनका स्पर्धा 400 मीटर के प्रतियोगिता विजेता चार्ल्स डार्विन के साथ हुई तो बहुत सारी नई चीजें भी सीखने को मिली। इस दौरान उन्होंने दूसरे देश से बहुत नई-नई चीजें सीखें। सन 1958 में कटक में होने वाले रेस में मिल्खा सिंह ने 200 मीटर और 400 मीटर के प्रतियोगिता में खुद को जीत दिलाई। मिल्खा सिंह के इस जीत के कारण देश के चारों तरफ मिल्खा सिंह का कीर्तिमान स्थापित हो गया। इस जीत के बाद मिल्खा सिंह के कदम दिन प्रतिदिन ऊंचाइयों को छूने लगे।

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लेकिन बात 1960 की है। पाकिस्तान का एक मशहूर धावक अब्दुल बासित हुआ करता था। मिल्खा सिंह ने अब्दुल बासित को पाकिस्तान में ही हराया था। इस जीत के बाद मिल्खा सिंह का नाम भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय लेवल पर जाना जाने लगा। इस जीत के बाद मिल्खा सिंह को अयूब खान ने जो पाकिस्तान की बड़े ओहदे में थे उड़न सिख के नाम से नवाजा। इसी कारण से आज मिल्खा सिंह को फ्लाइंग जट्ट भी कहा जाता है। इन्हे फ्लाइंग सिख के नाम से भी पूरी दुनिया जानती है। (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी)

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इसके बाद मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में अनेकों बार ऐसी प्रतियोगिताओं में भारत को जीत दिलाई है। 1968 के रूम के ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ में ओलंपिक का सारा रिकॉर्ड ही तोड़ दिया था। मिल्खा सिंह ने 59 सेकंड में सारे रिकॉर्ड को तोड़ते हुए अपना नाम और भारत का नाम सबसे ऊपर स्थापित कर दिया था। मिल्खा सिंह ने भारत के उस समय में भारत को जीत दिलाई थी जब भारत के के लिए कुछ खास सुविधाएं उपलब्ध नहीं की जाती थी।  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी
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ना तो किसी खिलाड़ी के लिए ट्रेनिंग व्यवस्था थी उनकी उपयुक्त किसी पोशाक का व्यवस्था किया जाता था। रूम ओलंपिक के बाद मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए कि किसी भी स्टेडियम में जब मिल्खा सिंह उपस्तित होते थे तो उन्हें जनता पूरे जोश से भर देती थी उनका इस तरह अभिवादन किया जाता था मिल्खा सिंह के अंदर भी एक नए जोश और स्फूर्ति बढ़ बढ़ जाती थी। उस समय मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई सारी ट्राफी पदक और उनके जूते यहां तक कि उनके कपड़े और यूनिफार्म भी जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय में दान दे दिए गए थे। मिल्खा सिंह ने अपने जीते हुए सभी पद अपने उपयोग में लाए गए सारे जूते सभी लाल नेहरू स्टेडियम में बने खेल संग्रहालय को दान में दे दिया था।  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी
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1957 मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकेंड का नया रिकॉर्ड बनाया था। टोक्यो जापान में हुए तीसरे एशियन 1958 मिल्खा सिंह 400 मीटर तथा 200 मीटर में 2 नए रिकॉर्ड स्थापित किए। इतने रिकॉर्ड स्थापित करने के बाद मिल्खा सिंह का नाम गूंजने लगा था। 1959 ईस्वी में इनके द्वारा प्राप्त की हुए कृतियां के कारण भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों को देखकर इन्हें पदम श्री से सम्मानित भी किया था। 1960 ईस्वी में रूम ओलंपिक में भी मिल्खा सिंह ने ओलंपिक का रिकॉर्ड ही तोड़ दिया था। 1962 की मूवी एशियाई खेल में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीते थे। कहा जाता है कि जब मैदान में मिल्खा सिंह तोड़ते थे तो ऐसा लगता था जैसे ही वह हवा में उड़ रहे हो। मिल्खा सिंह खुद बताते है की  सुरुवाती दूर में दौड़ने के समय मिल्खा सिंह के  पैर से खून तक निकल जाते थे लेकिन मिल्खा सिंह की कड़ी मेहनत और लगन कभी उनके आगे आने वाले तकलीफों को टिकने नहीं दिया। पूरी जोश और जोर लगाकर अपने जीवन में दौड़ते रहे और एक समय ऐसा आ गया कि उन्हें फ्लाइंग जट्ट के नाम से पूरी दुनिया जानती है।  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
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मिल्खा सिंह के बारे में और भी बहुत सारी रोचक जानकारियां ऐसी है जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे। कहां जाता है शुरुआती दौर में जब उन्होंने सेना में भर्ती किया गया था। तो जब खाली समय में सारे सैनिक आराम किया करते थे तो मिल्खा सिंह पास से गुजरने वाले एक ट्रेन से रेस किया करते थे।  इसी दौरान चंडीगढ़ में मिल्खा सिंह की मुलाकात निर्मल कौर से हुई जो 1955 में भारतीय महिला वॉलीबॉल टीम की कप्तान हुई थी। मिल्खा सिंह को निर्मल कौर पसंद आ गई और निर्मल कौर को भी मिल्खा सिंह पसंद आ गए और दोनों ने आपस में शादी कर ली। शादी के बाद मिल्खा सिंह को चार संताने हुए जिनमें तीन बेटियां और एक बेटा है। मिल्खा सिंह के बेटे का नाम जीव मिल्खा सिंह है। 1999 में उन्होंने 7 साल के एक बेटी को गोद भी लिया था जिसका नाम हवलदार विक्रम सिंह था। जो टाइगर हिल  के युद्ध के दौरान शहीद हो गया था।  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
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सन 1958 में ओलंपिक की दौड़ में असीम सफलता पाने के बाद मिल्खा सिंह को भारत सरकार के द्वारा जूनियर कमीशन ऑफिसर के तौर पर सम्मानित किया गया। कुछ दिनों के बाद पंजाब सरकार ने मिल्खा सिंह को शिक्षा विभाग में खेल निदेशक के पद पर नियुक्त कर दिया। इस पद से मिल्खा सिंह 1998 में सेवा से निवृत्त किया गया। जैसा कि मैंने आपको पहले भी बताया है कि 1958 में भारत सरकार ने मिल्खा सिंह को पद सम्मानित किया। 2001 में भारत सरकार के द्वारा मिल्खा सिंह को अर्जुन पुरस्कार देने का भी जिक्र किया गया  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
जिसे मिल्खा सिंह ने ठुकरा दिया। 2013 के जून महीने में मिल्खा सिंह ने अपनी बेटी सोनिया सांवल्का के साथ मिलकर अपनी आत्मकथा The Race of my Life जैसी किताबें भी लिख डाली। इस किताब से प्रेरित होकर हिंदी फिल्म निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने भाग मिल्खा भाग जैसे फिल्म का चित्रण किया। फिल्म में मिल्खा सिंह का किरदार मशहूर अभिनेता फरहान अख्तर ने बखूबी निभाया। फिल्म के बॉक्स ऑफिस से आने के बाद मिल्खा सिंह ने भी इस फिल्म की जमकर तारीफ की।  (फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की जीवनी और इनके जीवन की प्रेरणदायक कहानी )
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