पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 ईo मथुरा के एक छोटे से गांव नगला चंद्रभान में हुआ था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म बहुत ही गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। यदि हम बात पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के बारे में करते हैं। तो यह कहना बहुत ही मुश्किल साबित होता है। कि यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जिंदगी की शुरुआत थी। अर्थात यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के संघर्ष की शुरुआत थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के व्यक्तित्व के बारे में जितनी चर्चा की जाए उतनी कम होगी। (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय बड़े ही प्रभावशाली व्यक्ति थे। साधारण परिवार में जन्मे पंडित दीनदयाल उपाध्याय बड़े ही साधारण विचार के और अपने साधारण व्यक्तित्व के लिए अद्वितीय इंसान माने जाते हैं। अगर सही मायने में देखा जाए। तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चेहरा किसी भीड़ में आसानी से गुम हो जाने वाला था। दूसरी भाषा में कहा जाए तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय किसी भी तरह से यह नहीं पता चलने देते थे। कि उनके अंदर कितने बडी प्रतिभा छिपी हुई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की यदि व्यक्तित्व के बारे में बात किया जाए तो समुंद्र से गहरी सोच आकाश का व्यक्तित्व वाले थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत देश के प्रति अपने लगन के कारण कई सारे ऐसे कार्य किए। जिससे हमेशा पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पूरा भारत वर्ष अपने हृदय में समाहित रखेगा।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पिता का नाम भगवती प्रसाद था। और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के माता का नाम राम प्यारी देवी था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के छोटी आयु की अवस्था में ही इनके माता-पिता का देहांत हो गया। लेकिन माता-पिता के देहांत हो जाने के बाद भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने पढ़ाई-लिखाई में किसी प्रकार की कोई अड़चन आने नहीं दी । अपने पढ़ाई-लिखाई के प्रति लगन के कारण उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई सीकर के कल्याण हाई स्कूल से अपने दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की। दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने 12वीं की पढ़ाई पिलानी के बिरला कॉलेज से संपन्न किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा रुचि होने के कारण इन्हें दोनों परीक्षाओं में गोल्ड मेडल प्राप्त हुआ। (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

शुरुआती दौर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय पढ़ने लिखने के बहुत ज्यादा शौकीन थे। इसी कारण से इतनी खराब परिस्थितियों के आने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने पढ़ाई-लिखाई में किसी प्रकार की कोई असुविधा उत्पन्न नहीं होने दी। दोनों परीक्षा में अच्छे नंबर से पास होने के कारण पंडित दीनदयाल उपाध्याय को दोनों बार गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। और उस समय के सीकर के तत्कालीन महाराजा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को छात्रवृत्ति देना भी शुरू कर दिया था। अपनी बी.ए के पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से अपने आगे की पढ़ाई शुरू कर दी।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

इस तरह से पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी बी.ए की पढ़ाई कानपुर से सनातन कॉलेज से पूरी थी। कहां जाता है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने कॉलेज में पढ़ाए जाने वाले विषयों की तो पढ़ाई करते ही थे। साथ ही साथ जो विषय उस कॉलेज में नहीं पढ़ाए जाते थे। उनके बारे में भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय गहरी अध्ययन किया करते थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय व्यक्तित्व सभी छात्रों से बिल्कुल अलग था। अपने कॉलेज की पढ़ाई करने के दौरान ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय का संपर्क श्री बलवंत महाशब्दे से हुआ था। श्री बलवंत महाशब्दे के विचार से पंडित दीनदयाल उपाध्याय इतने प्रभावित हुए की 1937 मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो गए।  

इसी दौरान पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने निजी संघर्षों से निकल के राष्ट्र के संघर्षों में अपना योगदान देने का विचार बना लिया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आपने आगे की पढ़ाई करने के लिए आगरा चले गए। आगरा आने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने की पढ़ाई करनी शुरू कर दी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आगरा आने के बाद वह अपने पढ़ाई के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के होने वाले कार्यक्रमों में भी अपने भरपूर सहयोग देना शुरू कर दिए। इसी कार्यक्रम में अपना सहयोग देने के समय में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मुलाकात नानाजी देशमुख के साथ अपना संपर्क बनाया।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के माता पिता के मृत्यु के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय का लालन-पालन उनके मामा ने किया था। अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय बड़े हो चुके थे। इसी कारण से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मामा को यह लगने लगा कि अब उनका भांजा बड़ा हो चुका है। वह अपने परिवार के लिए कुछ करेगा। लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का परिवार अब बहुत बड़ा हो चुका था। वह पूरे भारत देश को अपना परिवार मानने लगे थे।

समस्त भारत को अपना परिवार मानने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय अब अपने भारत देश के लिए कुछ करने की सोच रहे थे। आप लोगों को यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सिविल सेवा में उत्तीर्ण होने के बाद भी सिविल सेवा को परित्याग कर दिया था। जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सिविल सेवा में उत्तीर्ण होने के बाद भी इस का परित्याग कर दिया। तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मामा को इस विषय पर बहुत चिंता होने लगी। वह सोचने लगे कि यह बालक आगे चलकर क्या करेगा। इसी कारण से जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मामा ने इनसे प्रश्न किया तो जवाब में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी अपने मामा को एक पत्र लिखा।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

इस पत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा कि जब किसी मनुष्य को लकवा मार जाता है। तो वह चेतना सुन्न हो जाता है। इसी तरह से हमारे समाज को भी लकवा मार चुका है। इसे कोई कितना भी कष्ट क्यों न दे। इसे महसूस नहीं होता है। यह दर्द तभी महसूस करता है। जब चोट के सर पर लगती है। हमारी पतन का कारण हमारे संगठन की कमी है। जैसे कि अशिक्षा दुसरे अवस्था के लक्षण माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त पंडित दीन दयाल उपाध्याय कुछ भी नहीं करना चाहते थे। परमात्मा ने हम सभी लोगों को एक समान बनाया है। तो क्या हम सभी लोगों में से कोई एक इंसान इस समाज के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकता है।

आपने मुझे शिक्षा दीक्षा देकर सभी प्रकार से क़ाबिल बनाया है। क्या आप मुझे समाज के लिए नहीं दे सकते हैं। जिस समाज के हम उतने ही ऋणी है। यह तो एक प्रकार का छोटा सा उपहार हमारे समाज के लिए होगा। हम अपनी पूरी जिंदगी यदि समाज के प्रति लगा देते हैं। फिर भी हम अपने समाज के द्वारा प्राप्त किए गए। ज्ञान और सम्मान का पूरी जिंदगी में नहीं चुका सकते हैं। इस पत्र के लिखने के माध्यम से पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जो भी बातें अपने मामा को बताई। इसके बाद वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे। भारत देश कब स्वतंत्र हो चुका था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी भारत देश के लोगों में संगठन नाम मात्र ही थी।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

भारत देश के आजाद होने के बाद देश में कई तरह की विसंगतियां उत्पन्न हो रही थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय को सत्ता का किसी प्रकार का लोभ नहीं था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय समाज में उठ रही विसंगतियों को सही करने के लिए तत्पर थे । अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी -जान से जुड़ गए। दीनदयाल उपाध्याय का कहना था। कि आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति का अनुमान समाज के ऊपर के सीढ़ियों पर पहुंचे हुए। व्यक्ति नहीं बल्कि नीचे के स्तर पर विराजमान व्यक्ति से होगा। अब दीनदयाल उपाध्याय के जिंदगी में भी बहुत तरह के बदलाव आ चुके थे।

अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्र के हित के बारे में बहुत तरह की सोच को प्रकाशित करना चाहते थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए लखनऊ में राष्ट्रधर्म प्रकाशन संस्था की स्थापना की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने इस संस्था के स्थापना करने के बाद राष्ट्र धर्म मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया कहा जाता है। कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व इतना साधारण था। कि कोई भी आसानी से पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इस व्यक्तित्व को नहीं पहचान पाता था। राष्ट्र के गंभीर से गंभीर समस्या को भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने दैनिक जीवन में उलझे रहने के बाद भी बड़े सरलता से निपटा दिया करते थे।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इन्हीं सब प्रतिभाओं के कारण इन्हें राजनीतिक क्षेत्र का भी दायित्व सौंपा गया। 21 सितंबर 1951 ईस्वी को उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक सम्मेलन का सफल आयोजन किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के द्वारा आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में ही एक नए राजनीतिक दल का उदय हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस राजनीतिक दल का नाम भारतीय जनसंघ रखा गया। दल के सफलता के कारण पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन में एक ऐसा समय भी आया। जब 1968 ईस्वी को पंडित दीनदयाल उपाध्याय को दल के अध्यक्ष के लिए चुना गया। जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय को संघ का अध्यक्ष बनाया गया। तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने संग को और ज्यादा बड़ा करने के लिए। भारत देश के दक्षिण में भी अपने विचार और प्रभाव को विस्तारित करने के लिए कई जगहों पर आयोजन किया।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की छवि को देखकर डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखजी ने कहा था। कि यदि भारत देश में 2 पंडित दीनदयाल उपाध्याय होते। तो भारत देश दुनिया का सबसे बड़ा और संगठित देश माना जाता। लेकिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन में दुख की घड़ी तब आई। जब डॉक्टर मुखर्जी की रहस्यमई मृत्यु हो गई। नवजात पार्टी को संभालने की जिम्मेदारी पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कंधे पर आ गया। हालांकि उस समय इस पार्टी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अलावा कोई भी ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं था। जो इस पार्टी का कमान अपने हाथों में संभाल सकता। इसी कारण से पार्टी के सभी लोगों ने यह कार्य-भार पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पे रख दी।  (पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन की जानकारी)

लेकिन पूरे देश के लिए शोकाकुल समय तो तब आ गया। जब 11 फरवरी 1968 को बज्रघात हुआ। इसी दिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय का हत्या कर दिया गया था। पूरा भारत देश शोकाकुल हो गया था। लेकिन पंडित दीनदयाल के स्वर्गवास होने से पहले ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत देश के लिए इतना कुछ कर गए। जिस का बखान करना आसान नहीं है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारत को ऐसा मार्गदर्शन प्रदान किया। जो भारत देश से लुप्त होने लगा था।

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