छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा

छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा

छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा

मैं आज आपको एक ऐसे वीर के बारे में बताने जा रहा हूं। जिन्होंने अपना सारा जीवन मातृभूमि और अपने लोगों की आजादी के लिए समर्पण कर दिया। इनका नाम है। छत्रपति शिवाजी महाराज। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने वाले और मुगल शासको के राजाओं की नाक में दम कर के रखने वाले भारत में स्वराज की भावना को जन्म देने वाले एक ऐसे वीर की कहानी आज मै आप आप सभी को बताने जा रहा हु। ये बात बिलकुल सही है। की छत्रपती शिवाजी महाराज का सारा संघर्ष उस कट्टरता के विरुद्ध था। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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जिसे औरंगजेब जैसे शासकों और उस की छत्रछाया में पलने वाले लोगों ने अपना रखा था। वीर छत्रपती शिवाजी महाराज राष्ट्रीयता के जीवन परिचय एवं परिचायक थे। इसी कारण से वीर छत्रपती शिवाजी महाराज की तुलना भी महाराणा प्रताप के साथ साथ की जाती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं। जिसका नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। जिस समय लगभग पूरे उत्तर भारत पर मुगलों का राज था। जिस समय हिंदू धर्म खतरे में था। 17 वीं शताब्दी में पूरे भारत पर मुगल साम्राज्य का आधिपत्य था। 

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जिस समय भारत के अधिकतर राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। उस समय एक चिंगारी भारत के दक्षिण में जल रही थी। जिसने भारत में हिंदवी स्वराज्य के लिए लोगों के मन में उत्सुकता पैदा कि इस राजा का राज्य भले ही बड़ा नहीं था। लेकिन इस राजा ने जिस विचार को जन्म दिया। उस विचार ने भारत में मराठा साम्राज्य का शासन दक्षिण से लेकर पाकिस्तान तक कर दिया था। उत्तर भारत में शाहजहां का शासन था। बीजापुर में सुल्तान मोहम्मद आदिल शाह और गोलकुंडा में सुल्तान अब्दुल्ला क़ुतुब शाह का शासन हुआ करता था। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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वही दूसरी तरफ की बात की जाए तो बंदरगाहों पर पुर्तगालियों का कब्जा था। 17 वी शताब्दी भारत के लिए ऐसा समय माना जाता है। जहां चारों तरफ मुगलों का शासन था। पूरे भारत में मुग़ल शासक हुआ करते थे। और बंदरगाहों पर भी पुर्तगालियों का कब्जा हुआ करता था। जमीन पर मुगलों का अधिकार होने के कारन हमेशा सेना के लिए मुस्लिम अफसरों को प्राथमिकता दिया जाता था। उसी समय शहाजी भोसले आदिल साह के सेना अध्यक्ष थे। 19 फरवरी 1930 को महाराष्ट्र में शिवनेरी के किले में शहाजी भोसले और जीजा बाई के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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यही बालक आगे जाकर छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से विख्यात हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज के सेना अध्यक्ष होने के कारन जयादातर अपने घर से बाहर ही रहना पड़ता था। इसीलिए उनका बचपन उनकी माता जीजाबाई के मार्गदर्शन में बीता। सुरवात से ही छत्रपति शिवाजी महाराज अपनी माँ के साथ ही जयादा समय व्यतीत करते थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के दादाजी कोंडदेव ने उन्हें बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा दी। बचपन से ही माता जीजाबाई ने छत्रपति शिवाजी महाराज को हिंदू धार्मिक ग्रंथ के बारे में विस्तार से बताया था। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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शिवाजी एक समर्पित हिंदू थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने रामायण और महाभारत का गहरा अध्ययन किया था। छत्रपति शिवाजी महाराज आदिल साह के राज्य में थे। लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज को कभी से आदिल साह की गुलामी पसंद नहीं था। यह बड़े आश्चर्य की बात है। कि वीर छत्रपति शिवाजी महाराज ने मन ही मन इतना बड़ा फैसला ले लिया था। वीर छत्रपति शिवाजी महाराज को यह बिलकुल कबूल नहीं था। कि वह किसी अन्य शासन के अंदर गुलामी करे। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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इसी कारण से छत्रपति शिवाजी महाराज ने आदिल शाह के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता जी आदिलशाह के यहां काम करते थे। इसी कारण से कई बार छत्रपति शिवाजी के पिता जी अपने पुत्र शिवाजी महाराज को समझाने की कोशिश करते थे। कि वह आज आदिल शाह के खिलाफ ना जाए। नहीं तो परिणाम बहुत ही बुरा साबित हो सकता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता ने कई बार छत्रपति शिवाजी को समझाया भी कि वह इस तरह के कार्य को ना करें

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और आदिल शाह के सेना में शामिल हो जाए। लेकिन वीर शिवजी को आदिलशाह की अधीनता स्वीकार न थी। 15 साल की आयु में ही छतपती शिवाजी महाराज को यह बात तो अवश्य पता चल गई थी। कि यदि उनके पास अगर कोई किला नहीं है। यदि उनके पास किला नहीं है तो वो कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसी कारण से छत्रपति शिवाजी ने एक चाल चली। और आदिल साह  के कुछ सामंतों को रिश्वत देकर आपस में फूट डालने शुरु कर दी। छत्रपति शिवाजी महाराज का यह विचार काम में आने लगा। और धीरे-धीरे उन्हें 2 किलो भी हासिल हो गए।(छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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दो किले हासिल करने के बाद भी छत्रपति शिवाजी यहां पर भी नहीं रुके। और उन्हें आगे के किलो पर अपना अधिपत्य जमाने का मन बना चुके थे। यह सब जब आदिल शाह ने देखा तो उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बना लिया। शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बना लिया तो शिवाजी महाराज ने 7 साल तक उसके ऊपर कोई भी आक्रमण नहीं किया। क्योंकि उन्हें यह ज्ञात था। कि यदि वह आदिल साहब पर किसी भी तरह का कोई आक्रमण करते हैं। तो उनके पिता को जान से मार दिया जाएगा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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अतः अपने पिता की जान बचाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने आदिल साहब पर कोई भी आक्रमण नहीं किया। लेकिन शिवाजी महाराज ने अपनी शक्ति और सेना को बढ़ाने में लगे रहे। शिवाजी महाराज को यह पता था।  कि यदि उन्हें आदिलशाह से टक्कर लेनी है।  तो उन्हें अपनी शक्ति का विस्तार करना पड़ेगा। धीरे-धीरे यह बात पूरे देश में फैलती जा रही थी। इसी कारण से बीजापुर की बड़ी साहिबा ने अफजल खान को 120000 सैनिकों के साथ शिवाजी महाराज को रोकने के लिए और शिवाजी महाराज पर हमला करने के लिए अफजल खान को भेजा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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अफजल खान ने शिवाजी महाराज को जान से मारने के लिए और उन्हें बंदी बनाने के लिए भोले भाले लोगों की हत्या कर दी। यहां तक ही नहीं अफजल खान ने कई सारे हिंदू मंदिरों को भी तोड़ दिया। लेकिन शिवाजी महाराज ने अफजल खान को अपनी चतुराई और रण कौशल और गोरिल्ला वार जिसे छापामार पद्धति युद्ध के नाम से भी जाना जाता है। इसी युद्ध पद्धति से शिवाजी महाराज ने खुद को बचाए रखा। लेकिन जब अफजल खान को यह बात ज्ञात हो गया कि शिवाजी महाराज को सामने से हरा पाना बहुत मुश्किल है। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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तब उसने चतुराई से शिवाजी महाराज के पास संधि का प्रस्ताव भेजा। संधि का प्रस्ताव सुनकर शिवाजी महाराज ने अफजल खान से मिलने का फैसला किया। हालांकि अफजल खान ने साथ में यह भी कहा था।  कि शिवाजी महाराज को अकेले और निहत्थे अफजल खान से मिलने आना है। क्योंकि अफजल खान या चाहता था। कि यदि शिवाजी महाराज अकेले उसके पास मिलने आते हैं। तो वह उनका कत्ल करने में सफल साबित हो सकता है। इसी कारण से अफजल खान ने बड़ी चतुराई से संधि के विषय पर शिवाजी महाराज को अपने किले में आने के लिए में न्योता भेजा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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लेकिन इस बात का संशय शिवाजी महाराज को पहले ही हो चुका था। क्योंकि वह अफजल खान के बारे में बड़ी अच्छी से जानते थे। कि वह बड़ा ही धूर्त और चालाक है। लेकिन संधि के प्रस्ताव को देखकर शिवाजी महाराज ने मिलने को हां कह दिया। और अफजल खान से मिलने चले गए। जब वह अफजल खान के सामने पहुंचे तो अफजल खान ने बड़े प्यार से शिवाजी महाराज को गले मिलने के लिए बुलाया। अफजल खान शिवाजी महाराज के लंबाई से दुगुनी और काफी हट्टा कट्टा इंसान था।

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अफजल खान ने शिवाजी महाराज को गले लगाने के बहाने से अपने मजबूत बाजू में कैद कर लिया। और शिवाजी महाराज को जान से मारने की कोशिश करने लगा। लेकिन जैसा कि मैंने आप सभी को पहले ही बताया था। कि शिवाजी महाराज को इस बात का संदेह पहले ही हो चुका था। और शिवाजी महाराज अफजल खान से मिलने आने से पहले अपने बाघ नख को अपने शरीर के अंदर छुपा रखा था। जब शिवाजी महाराज ने देखा कि अफजल खान उन पर जानलेवा हमला कर रहा है।  तो उन्होंने आराम से अपने बाघ नख को निकाला (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा
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और अफजल खान के पेट में घुसा के उसके पेट को ही काट डाला। इस तरह से शिवाजी महाराज ने अफजल खान को हमेशा के लिए इस दुनिया से खत्म कर दिया। अफजल खान के मरने के उपरांत शिवाजी महाराज ने अफजल खान के द्वारा लाई गई 120000 सैनी को भी हराया। अफजल खान के मृत्यु के उपरांत अफजल खान के किलो पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया। अफजल खान की मृत्यु से क्रोधित होकर बीजापुर के सुल्तान आग बबूला हो गया।और उसने शिवाजी को मारने के नए साजिस रचने लगा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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लेकिन इस बार शिवाजी महाराज पहले से तैयार थे। और 28 दिसंबर को शिवाजी महाराज ने रुस्तम खान की सेना को सामने से हमला कर दिया। फिर क्या था कायर रुस्तम खान युद्ध के बीच में ही अपनी जान बचा कर भाग गया। लेकिन इस तरह के लगातार युद्ध के कारण बीजापुर में आतंक का माहौल बन चुका था। इस तरह से बीजापुर के आसपास के सामंतो ने आपस में एक सभा बुलाई। और सब ने मिलकर शिवाजी महाराज को बंदी बनाने का सोचा। इस समय शिवजी महाराज पन्हाला किले में ही थे।

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तो उन्हें बीजापुर के सामंतों ने चारों तरफ से घेर लिया। और अपने सैनिक के साथ शिवाजी महाराज को मारने की कोशिश करने लगा। लेकिन शिवाजी महाराज ने रात्रि के अंधेरे का फायदा उठाकर अपने भाइयों के साथ वहां से बाहर निकलने में सफल रहे। एक तरफ शिवाजी का शासन आसमान छू रही थी। उधर दूसरी तरफ औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को अपने ही किले में कैदी बना लिया। शाहजहां को अपने किले में कैद करके औरंगजेब वहां का राजा बन गया। शाहजहां के राजा बनने के बाद उसने अपने आधिपत्य दक्षिण की तरफ बढ़ाने की कोशिश करने लगा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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लेकिन औरंगजेब को यह पता चल चुका था। शिवाजी महाराज उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा साबित होगा। इसी कारण से औरंगजेब ने अपने मामा सहिस्ता खान को वीर शिवाजी महाराज को परास्त करने के लिए सैनिको के साथ शिवाजी महाराज पर हमला करने का हुक्म दिया। लेकिन अब समय ऐसा आ चुका था। कि शिवाजी महाराज भी किसी को टक्कर देने के लिए तैयार थे। उनके पास भी एक अच्छी खासी सैनिक की टुकरिया जमा हो चुकी थी। जब शाइस्ता खान और वीर शिवाजी के बीच युद्ध चल रही थी। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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तो शाइस्ता खान को वहां से अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। शाइस्ता खान वीर शिवाजी के सामने से तो अपनी जान बचाने में सफल रहा। लेकिन उसे अपने हाथ के चार उंगलियां गंवानी पड़ी। वीर शिवाजी महाराज की तलवार के एक धार से ही सहिस्ता खान के हाथ के चार उंगलियां कट कर ढेर हो चुकी थी। जब शाइस्ता खान को लगा कि वीर शिवाजी अब उसके प्राण पखेरू तोड़ देगा। तो उसने वहां दरवाजे से कूदकर अपने भाग जान बचाने में सफल रहा। हलाकि सहिस्ता खान ने शिवाजी महाराज के पूरे साम्राज्य को जलाकर खाक कर दिया था।

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इस बात को देखकर शिवाजी महाराज बहुत दुखी हुए। और अपने इस हर्जाने को पूर्ति करने के लिए उन्होंने 1664 ईस्वी में मुगल व्यवसाय केंद्र सूरत पर हमला बोल दिया। शिवाजी ने 4000 की सेना के साथ 6 दिनों तक सूरत के व्यापारियों को लूटे। हालांकि कहा जाता है कि जब शिवाजी महाराज सूरत के व्यापारियों को लूट रहे थे। तब वहां के किसी भी आम जनता को कोई परेशानी नहीं उत्पन्न हो रही थी। उन्होंने अपने सेना में साफ-साफ यह बता रखा था। कि आम जनता को किसी भी तरह का कोई तकलीफ नहीं होना चाहिए। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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और वहां की औरतों को किसी भी तरह की कोई परेशानी उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। उनका मकसद बस वहां के व्यापारियों से अपना हर्जाना वसूलने का था।  जब यह बात औरंगजेब को पता चला तो वह बहुत ही आग बबूला हो उठा। वह शिवाजी महाराज को जान से मारने के लिए बहुत सारे प्रयत्न करने लगा। इसी कारण से औरंगजेब ने शिवाजी को जान से खत्म करने के लिए मानसिंह को चुना। औरंगजेब ने मानसिंह को 200000 सैनिक के साथ शिवाजी को खत्म करने के लिए भेजा। हालांकि इस युद्ध में शिवाजी की हार हुई। और उन्हें पुरंदर की संधि करना पड़ा।

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इसी कारण से आज से पुरंदर की संधि भी कहा जाता है। पुरंदर की संधि के कारण शिवाजी महाराज को अपने 23 किलो और ₹400000 की मुद्रा भी गंवानी पड़ी। और अपने पुत्र संभाजी को मुगल दरबार में भेजना पड़ा। और बीजापुर से लड़ने के लिए उनका साथ भी देना पड़ा। हालांकि औरंगजेब यह चाहता था। कि वह बीजापुर पर हमला करें। और इसके लिए उसे शिवाजी के मदद की जरूरत थी। अतः इस संधि में उसने यह शर्त रखी कि उसे बीजापुर के खिलाफ औरंगजेब का साथ देना होगा। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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शिवाजी से मिलने के लिए औरंगजेब ने उन्हें आगरा बुलाया। लेकिन 12 मई 1666 को औरंगजेब ने शिवाजी को अपने दरबार में सेनापति के पीछे खड़ा कर दिया। शिवाजी को यह अपना अपमान पसंद नहीं आया। और उन्होंने औरंगजेब के खिलाफ उनके दरबार में ही बोलना शुरु कर दिया। लेकिन यहां चारों तरफ शासन औरंगजेब का था। इसी कारण से औरंगजेब ने शिवाजी महाराज और उसके पुत्र संभाजी को कैद कर लिया। यह औरंगजेब के जीवन के सबसे बड़ी भूल साबित हुई क्योंकि शिवाजी महाराज तो शिवाजी महाराज ही थे।

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अपने रणकौशल और युद्ध नीति के कारण शिवाजी महाराज कुछ ही दिनों में वहां से भाग निकलने में सफल साबित हुए। शिवाजी महाराज औरंगजेब की कैद से फलों की टोकरी में छिपकर के साथ वहां से भाग निकलने में सफल हुए।  वीर शिवाजी महाराज आगरा से निकल के गुजरात पहुंचे और गुजरात के रास्ते फिर से अपने किले के पास वापस आ गए। आगरा से निकलने के बाद भी शिवाजी महाराज ने अपने पुत्र संभाजी को रास्ते में ही बनारस के एक पंडित के यहां छोड़ दिया। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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औरंगजेब के कैद आजाद होने के बाद संधि में हारे हुए अपने 23 किले भी हासिल कर लिया।शिवाजी महाराज ने संधि में हुए किसी भी फैसले को मानने से इनकार कर दिया। 1670 ईस्वी में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी महाराज ने लूटा और नगर से 132 लाख की संपत्ति शिवाजी को हाथ लगी। सूरत से लौटने के समय शिवाजी महाराज ने वापस आने के समय मुगलों की सेना को फिर से एक बार हराया। इस तरह से 6 जून 1674 को शिवाजी महाराज ने अपना राज्यभिषेक किया। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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शिवाजी ने आ रहे कितने सालों की परंपरा को तोड़कर पहली बार मराठा साम्राज्य का उद्घाटन किया। क्योंकि पिछले कई सदियों से मुगल शासन के अधीन भारत चलता आ रहा था। पहली बार शिवाजी महाराज ने अपने हिम्मत और बुद्धि का कौशल दिखाया। और मराठा साम्राज्य के शासक बने। शिवाजी महाराज के बारे में सबसे प्रसिद्ध यह बात है। कि वह कभी किसी नारी का निरादर नहीं करते थे। सभी नारी को अपनी माता के समान मानते थे। चाहे वह किसी धर्म जाति का हो। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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शिवाजी महाराज के नजर में नारियों का आदर होना अनिवार्य था। उनके शासनकाल में अगर किसी नारी का अपमान होता था। तो उसके लिए वह कठिन से कठिन दंड भोगने का भागी होता था। लेकिन 1680 में शिवाजी महाराज की तबीयत खराब हो गई और तेज बुखार के चलते 5 अप्रैल 1680  52 साल की उम्र में ही भारत के वीर शिवाजी का स्वर्गवास हो गया। शिवा जी के स्वर्गवास होने के उपरांत औरंगजेब को यह लगने लगा कि अब शिवाजी के मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य का पतन हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। (छत्रपती शिवाजी महाराज के जीवन की संघर्ष से विजेता का सम्पूर्ण कथा)

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शिवाजी महाराज के स्वर्ग सुधारने के बाद शिवाजी के पुत्र संभाजी के नेतृत्व में मराठों ने युद्ध करते हुए अपनी स्वतंत्रता को बरकरार रखा। औरंगजेब लगभग 25 वर्षों तक मराठाओं से युद्ध करता रहा। 25 वर्षों तक लगातार युद्ध करने के कारण औरंगजेब की हालत खराब होने लगी। और वह कमजोर पड़ने लगा। इसी कारण से मुगल का पतन होना भी शुरू हो गया। शिवाजी महाराज के द्वारा किए गए कार्य बलिदान और साहस के चलते हमेशा शिवाजी महाराज हमारे हृदय में जिंदा रहेंगे। 

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